इंदौर। रामचरित मानस में लिखा है- मागी नाव न केवटु आना । कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ॥.... ऐसा माना जाता है कि भगवान राम के अवतार से पहले देवी-देवता जो कार्य को कर सकते थे, भगवान के सहायक बनने के लिए जन्म ले चुके थे। इसीलिए केवट ने कहा कि मैं आपका मर्म जानता हूं। आपके चरण कमलों के स्पर्श से शिला नारी हो गई, यदि मेरी नाव नारी बन गई तो, एक नारी पहले से ही है, मैं दो-दो नारियों का पालन कैसे करूंगा। यह उसकी चतुराई थी। वह तो भगवान का आशीर्वाद लेना चाहता था। अपने पूरे कुल को तारना चाहता था। ऐसा कह कर केवट ने भगवान को उनके चरण धोने के लिए तैयार कर लिया था। भगवान ने उस पर कृपा की और भगवान सहज ही उससे चरण धुलवाने के लिए तैयार हो गए।
एरोड्रम के निकट पीथमपुर बायपास रोड स्थित शंकराचार्य मठ के अधिष्ठाता डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने केवट जयंती के उपलक्ष्य में बुधवार को अपने प्रवचन में यह बात कही। इस अवसर पर देवी सिंह केवट और उनके साथियों से मठ में पूजन-आरती कर डॉ. गिरीशानंदजी महाराज से आशीर्वाद लिया।
केवट की चतुराई
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा, गोस्वामी तुलसीदास ने बहुत सुंदर वर्णन किया है- चरन कमल रज कहुं सब कहई। मानुष करनि मूर कछु अहई।। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।...भगवान राम से केवट बड़ी चतुराई से बोला, जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री हो गई, मेरी नाव तो लकड़ी की है। यदि आपकी चरण रज से मेरी नाव भी स्त्री हो जाएगी तो मैं तो लुट जाउंगा। मेरे रोजगार का साधन ही समाप्त हो जाएगा। मेरे भरण-पोषण का साधन ही समाप्त हो जाएगा। मेरा दूसरा कोई धंधा भी नहीं है।
लकड़ी के पात्र में भगवान राम के पांव पखारे
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने बताया केवट राम के चरण धोने के लिए लकड़ी का कठौंदा ( पात्र) लाया, क्योंकि वह जानता था, कि वनवास करने वाले धातु के पात्र का स्पर्श नहीं करते। इसीलिए शंकराचार्य भी न तो धातु के पात्र में भोजन करते हैं और न ही उसमें पानी पीते हैं। केवट ने भगवान के चरण धोये। उसने कहा- आपके चरणों की कृपा तो प्राप्त हो गई, पूरी कृपा कैसे प्राप्त होगी। उसने दूसरा चरण लिया और बोला कि भगवान आप थक जाएंगे मेरे सिर पर हाथ रख लीजिए। केवट ने बड़ी होशियारी से भगवान का हाथ सिर पर रखवा लिया और उसने परम पद को प्राप्त किया, जिसे बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं प्राप्त कर पाए। भगवान और केवट की वार्ता सुनकर गंगाजी भी सोचने लगीं कि धन्य हैं भगवान आप, जो लोगों को भव सागर से तार देते हैं, आप गंगा पार होने के लिए ऐसी नर लीला कर रहे हैं, और केवट को मना रहे हैं।
केवट ने परिवार सहित भगवान का चरणोदक लिया
महाराजश्री ने कहा केवट ने अत्यंत आनंद और प्रेम से भगवान के चरण धोकर आशीर्वाद लिया। पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥... केवट ने सारे परिवार सहित भगवान का चरणोदक लिया और आनंद पूर्वक भगवान को गंगा पार उतार दिया। जब भगवान उसे उतराई देने लगे तो वह व्याकुल होकर भगवान के चरण पकड़कर विनती करने लगा कि प्रभु आज मैंने जो पाया है, वह कोई भी नहीं दे सकता। आज से मेरे दोष-दुरूख और दरिद्रता की आग बुझ गई है। मुझे भरपूर मजदूरी मिल गई है। बस आप इतनी कृपा करिए कि मैंने आपको गंगा पार किया है, आप मुझे भवसागर से पार कर देना। मेरे बुजुर्गों ने सिखाया है कि विद्वान ब्राह्मण, संन्यासी से केवल आशीर्वाद ही लेना। अभी तो आप राजपाट छोड़ 14 वर्ष के लिए संन्यासी हैं, आप लौटते समय जो भी देंगे, उसे प्रसाद समझकर सिर पर चढ़ाकर ले लूंगा। केवट ने भगवान से केवल निर्मल भक्ति का वरदान लेकर उन्हें विदा किया।
पूर्व जन्म में कछुआ था केवट
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि यह उल्लेख भी मिलता है कि पूर्व जन्म में केवट कछुआ था। उस समय लक्ष्मण शेषनाग और लक्ष्मी सीता भगवान की सेवा में लगे रहते थे। वह मन ही मन सोचता था कि यह सेवा मुझे कब मिलेगी। जब सीताजी का विवाह हुआ, लक्ष्मण भगवान की सेवा कर रहे थे, उसी समय सीताजी आईं, उन्होंने कहा लक्ष्मण अब आप जाओ, मैं सेवा करूगी। लक्ष्मण, भगवान की तरफ देखने लगे- बोले कि बचपन से तो मैं ही करता आया हूं। आप मुझे सेवा से वंचित कर रही हैं। भगवान न कहा- तुम दोनों प्रातरू काल वशिष्टजी से जाकर पूछना कि किसे सेवा करनी है। दोनों वशिष्टजी के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा एक पैर की सेवा लक्षमण करेंगे और दूसरे की सीता करेंगी। वहीं केवट दोनों चरण धोते हुए बड़े गर्व से सीता और लक्ष्मण की तरफ देखता है कि तुम्हारे ही सामने मैं भगवान के दोनों चरणों की सेवा कर रहा हूं। पूर्व जन्म की सेवा का भाव भगवान ने इस जन्म में पूरा कर दिया।
कर्म से हीन नहीं था केवट
महाराजश्री ने कहा केवट जाति से हीन था, लेकिन कर्म से हीन नहीं था। इसलिए भगवान ने उस पर कृपा की और उसके साथ उसका परिवार, बंधु और जाति भी तर गई। श्रीमद भगवद् गीता भी कहती है कि मन, वचन और कर्म से जो भगवान को समर्पित हो जाता है, वह भव सागर तर जाता है।