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May 20, 2024, 11:41 am
NEWS : अपने अंतिम समय में सेवा, सत्संग और साधना से ही मनुष्य का कल्याण संभव, श्रीमद् भागवत कथा में डॉ. स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने कहा, पढ़े खबर 

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प्रतापगढ़। मनुष्य को अपने अंतिम समय में अपने आत्म कल्याण के लिए सतत सेवा, सत्संग और साधना करनी चाहिए , श्री मद भागवत के इस अति महत्वपूर्ण वृतांत का उल्लेख करते हुए स्वामी डॉक्टर सत्यानंद जी ने नरसिंह घाट पर जारी श्री मद भागवत सप्ताह के द्वितीय दिवस पर राज ऋषि परीक्षित द्वारा अपनी मृत्यु के महज सात दिनों में अपने  कर्तव्य एवम आत्म कल्याण की मंशा से  महा ऋषि सुखदेव जी से पूछे गए उक्त संदर्भित प्रश्न और इसके जवाब का विस्तृत वर्णन करते हुए परम विद्वान स्वामी डॉक्टर सत्यानंद जी ने कहा कि परीक्षित का ये प्रश्न  सिर्फ उनके कल्याण नहीं वरन लोक कल्याण वाला सार्वभोम प्रश्न था।

स्वामी जी ने द्वितीय दिवस की कथा का प्रारंभ राजा परीक्षित द्वारा समित ऋषि के गले में अपने धुनुष के तीर की नोंक से मरा हुआ सांप डाल देने के अपराध को उनके सर पर धारित उस स्वर्ण मुकुट का कारक बताते हुए कहा कि स्वर्ण याने सोने में कलियुग का वास हैऔर अधर्म से कमाए गए धन से खरीदा गया सोना उसे पहनने वाले महिला पुरुष की मति को हर लिया करता है और यही कारण रहा कि धर्मग्य , दयालु, सदाचारी, सरलमाना राजा परीक्षित की बुद्धि को  उस सोने ने भ्रष्ट कर दिया था जो अनीति से कमाया हुआ था और जिसे पारक्षित ने बलात अधर्मी  जरासंघ से हथिया कर अपने सर पर धारण किया था।

इससे पूर्व स्वामी जी ने कोरव पांडव युद्ध और इसके पश्चात अश्वत्थामा द्वारा द्रौपदी के पांचों पुत्रों के वध, अर्जुन द्वारा  अश्वत्थामा के ललाट के बीच तीर मारकर उसकी  मणि निकल लेने, अर्जुन द्वारा उसे बंदी बना  लेने और फिर द्रौपदी के ये कहने पर कि अर्जुन ये आपके गुरुबका पुत्र है और इसके वध के बाद इसकी माता जो आपकी गुरुमाता है वे  अकेली रह जायेंगी, इस पर अश्वत्थामा को छोड़ दिए जाने आदि के वृतांत विस्तारपूर्वक श्रोताओं को बताए।

कथा के दौरान कीबोर्ड पर मधुर भजनों की गायन प्रस्तुति गायक उमाशंकर पचौरी और उनकी टीम ने प्रदान कर कथाआनंद को सूरमय स्वरूप प्रदान किया।

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