सिंगोली। कस्बे में 28 अगस्त बुधवार को वाल्मीकि समाज की ओर से पहली बार गोगा नवमी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान वाल्मीकि समाज के युवाओं ने गोगा देव महाराज का छड़ी निशान भव्य जुलूस के साथ निकाला। जुलूस देर शाम चौधरी मोहल्ला स्थित अंबेडकर तिराहे से रवाना होकर कस्बे के मुख्य मार्गाे से होता हुआ रात करीब 10 बजे बजरंग व्यायाम शाला पर विसर्जित हुआ। देश में खासकर राजस्थान में गोगा पंचमी के बाद गोगा नवमी का बड़ा महत्व है। क्योंकि भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी के दिन गोगा देव जी का जन्म हुआ था। गोगा देव जी को राजस्थान में लोक देवता के रूप में मान्यता है। लोक मान्यता और कथाओं के अनुसार गोगा जी को सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है।
इसलिए गोगा देव जी को प्रतीक रूप से पत्थर या लकड़ी पर सर्प के रूप में उकेरा जाता है।वाल्मीकि समाज के सबसे बड़े पर्व गोगा नवमी पर सिंगोली कस्बे में पहली बार भविष्य जुलूस निकाला गया। इस दौरान वाल्मीकि समाज ने महर्षि वाल्मीकि के चित्र को रथ में सजाया तथा लंबी बस को मोर पंख, रंगीन वस्त्र गोटा आदि से सजाकर गोगा पीर की छड़ी के रूप में कस्बे में घुमाया। वाल्मीकि समाज द्वारा पहली बार निकाले गए गोगा नवमी जुलूस का कस्बे में स्थानीय राजनेताओं और गणमान्य नागरिकों ने पुष्प वर्षा कर स्वागत किया।
बता दे की गोगा देव जी को राजस्थान में मुस्लिम समुदाय द्वारा भी गोगा पीर के रूप में पूजा जाता है। गोगा पीर को जाहरपीर भी कहा जाता है, जाहरपीर की उपाधि उन्हें महमूद गजनवी द्वारा उसे समय दी गई थी,जब उन्होंने गोवंश की रक्षा के लिए साक्षात देवता के रूप में उपस्थित होकर महमूद गजनवी से युद्ध किया था।
रणकपुर प्रशस्ति के मुताबिक गोगा देव महाराज 1024 ईस्वी में भूमि विवाद के चलते अपने चहेरे भाइयों के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। बाद में फिरोजशाह तुगलक ने हनुमानगढ़ में उनके मंदिर के रूप में गोगामेड़ी का निर्माण करवाया। गोगामेड़ी को मौजूदा स्वरूप बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने दिया है। गोगामेडी को हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है जहां हर साल व्यापक स्तर पर मेला लगता है।