मंदसौर। 'समर्पित भाव से की गई धर्मआराधना का सभी धर्मों में विशिष्ट महत्व है। जैन धर्म व दर्शन में ऐसे कई वृतान्त मिलते है जहां पूरे समर्पण भाव से धर्म आराधना व तप तपस्यायें कर श्रावक श्राविकाओं ने मोक्ष पाया। सुबाहुकुमार की धर्म आराधना भी उसी प्रकार की विशिष्ट थी। उन्होंने 12 वृत्तधारी श्रावक बनकर कई महिनों तक उत्कृष्ट तपस्याये की। माह में बड़ी पर्व तिथियों पर पोषक किये। उनकी तप तपस्या व धर्म साधना की उत्कृष्ठता के कारण ही जैसा धर्म के ग्रंथो में सुबाहु कुमार को स्थान मिला।'
उक्त उद्गार जैन साध्वी रमणीक कुंवरजी ने रविवार को शास्त्री कॉलोनी नईआबादी स्थित जैन दिवाकर स्वाध्याय भवन में कहें। उन्होंने तप तपस्याओं व धर्म आराधना का महत्व बताते हुए कहा कि धन पर आसक्ति छोड़ों धर्म पर आसक्ति रखो। जीवन में प्रभु भक्ति धर्म आराधना तप तपस्या पर ध्यान दो। आपने कहा कि जितना पुरूषार्थ धन कमाने के लिये करते हो। उतना पुरूषार्थ धर्म में करो।
जीवन में शरीर की चिंता करने की बजाय अपने आत्म कल्याण की चिंता करों जीवन में हमें सर्वाधिक आस्था जिनवाणी पर होना चाहिये। जिनवाणी पर जितनी श्रद्धा होगी। हम धर्म में उतनी सुदृढ़ता से तप तपस्यायें कर पाएंगे। हमारी जिनवाणी के प्रति श्रद्धा इतनी, मजबूत होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति हमें उससे डिगा नहीं पाए। धर्मसभा में साध्वी चंदनाश्रीजी ने भी अपने विचार रखे।