चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में चतुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्मानुरागियों से रूबरू होते हुए शांतक्रांति संघ की विदूषी महासती शीलप्रभा ने कहा कि हम सभी अरिहंत बनना चाहते हैं और इसी दिशा में हमारा पुरुषार्थ निरंतर जारी है। यदि हमे एक बार सम्यकत्व प्राप्त हो जाए तो अरिहंत बनना निश्चित हो जाता है परंतु ये सब कैसे संभव है..? इसको समझाते हुए महासती ने बताया कि जैसे दूध से दही और दही से छाछ और छाछ से मक्खन और मक्खन को तपाते हुए जब उसमें से छाछ रूपी विकार (विकृति) पूर्णतया समाप्त हो जाता है तो शुद्ध घी बन जाता है और वो हमेशा अपने शुद्ध स्वरूप ( घी ) में बना रहता है और उसे पुनः मक्खन या दही अथवा छाछ, दूध के रुप में परिणित नहीं किया जा सकता है। जैसे दूध के अंदर घी बनने की शक्ति रही हुई है,ठीक इसी तरह हमारी आत्मा में अरिहंत बनने की शक्ति मौजूद है परन्तु कर्माे के आवरण ने इसे पंगु बना कर इन्द्रिय विषयों का गुलाम बना दिया है जिस कारण हमने अपनी आत्मा की अनंत शक्ति को भुला दिया है। हमें चाहिए कि हम तत्वों में श्रद्धा रखने के साथ देव गुरु धर्म के प्रति पूरी समर्पणता अपनाने की कोशिश करते हुए अपनी आत्मा पर लगी हुई कर्माे की विकार रूपी छाछ जलाने का सम्यक प्रयास करके अरिहंत बनने की दिशा में आगे बढ़ें। इससे पूर्व साध्वी सत्यप्रभा ने उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्याय के मूल पाठ का वाचन करने के बाद कहा कि हम जिन धर्म आराधना के माध्यम से कर्मों के विकार को घटाने की धीरे धीरे कोशिश करेंगे तो आत्म विकास की सीढी चढ़ने में कामयाब होने की राह पर आगे बढ़ सकेंगे। महासती पुण्यप्रिया ने जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति में वर्णित 5 मेरु पर्वत ( जंबूद्वीप में 1 , धातकी खण्ड में 2 , अर्धपुष्करद्विप में 2 ) की जानकारी दी । धर्म सभा में साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा ने विमला देवी भड़कत्या को तेला तप एवम् अन्य प्रत्याख्यान कराने के बाद मंगल पाठ सुनाया। संचालन मंत्री इंद्रेश कोठारी ने किया।