खंडवा। जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी हो गई है। इसे लेकर सदस्यों ने जिला पंचायत कार्यालय से नियमावली मांगी है। दरअसल, पंचायत एक्ट में ढ़ाई साल के बाद अविश्वास प्रस्ताव लाने का नियम हैं। हालांकि, कन्फ्यूजन यह है कि परिषद के गठन को तो ढ़ाई साल हो गए है, लेकिन उपचुनाव के बाद अध्यक्ष बनीं पिंकी वानखेड़े के कार्यकाल को एक साल ही हुआ हैं।
जानकार बताते है कि, जिला पंचायत में अब तक किसी अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का रिकॉर्ड नहीं है। पिछले दो कार्यकाल के अध्यक्षों ने भी 5 साल का कार्यकाल पूरा किया है। 2011 में राजपालसिंह तोमर और 2015 में अध्यक्ष बनीं हसीनबाई भाटे ने भी पांच साल पूरे किए। इस बीच किसी प्रकार का विवाद सामने नहीं आया। ये स्पष्ट है कि, पंचायत एक्ट में ढ़ाई साल के कार्यालय के बाद अविश्वास प्रस्ताव लाने का नियम है। लेकिन खंडवा के मामले में विधि विशेषज्ञों से सलाह ली जा रही है।
कांग्रेस के साथ भाजपा के सदस्य भी नाराज चल रहे
कांग्रेस के साथ भाजपा सदस्यों की नाराजगी की वजह अध्यक्ष पिंकी वानखेड़े के पति सुदेश वानखेड़े है। भाजपा के सदस्य भी आरोप लगा चुके है कि वे अपने हिसाब से जिला पंचायत चलाना चाहते है। हालांकि भाजपा समर्थित सदस्य मंत्री पुत्र उपाध्यक्ष के कारण खुलकर विरोध नहीं जता पा रहे हैं। कांग्रेस समर्थित सदस्य पल्लवीसिंह राठौड़, राजकुमारी सिंह तोमर, मनोज भरतकर ने अविश्वास प्रस्ताव के नियम के संबंध में अफसरों से चर्चा की है।
अध्यक्ष और परिषद के कार्यकाल में डेढ़ साल का अंतर
जुलाई 2022 में जिला पंचायत की नई परिषद का गठन हुआ था, जिसे अभी की स्थिति में ढ़ाई साल हो गए है। अध्यक्ष बनीं कंचन तनवे को उनकी पार्टी ने विधायक का टिकट दे दिया और वे विधानसभा सदस्य के लिए निर्वाचित हो गई। ऐसे में तनवे को जिला पंचायत अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा। जनवरी 2023 में उपचुनाव हुए, तब से पिंकी वानखेड़े अध्यक्ष है। जिनके कार्यकाल को महज एक साल हुआ है। इस तरह अध्यक्ष और परिषद के गठन के कार्यकाल के बीच डेढ़ साल का अंतर है।
चिट्ठी से बनीं थी अध्यक्ष, प्रस्ताव आया तो नुकसान तय
जिला पंचायत में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को मिलाकर 16 सदस्य है। इनमें से 9 भाजपा, 6 कांग्रेस और एक निर्दलीय हैं। भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है लेकिन अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशी को बराबर वोट मिले थे। चिट्ठी निकाली गई तब जाकर भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित किया था।
ऐसा ही उपाध्यक्ष के चुनाव में हुआ। भाजपा प्रत्याशी मंत्री पुत्र दिव्यादित्य शाह के होते हुए भी कांग्रेस प्रत्याशी जितेंद्रसिंह चौहान को बराबर वोट मिले। यहां भी चिट्ठी से फैसला हुआ। मंत्री पुत्र को उपाध्यक्ष घोषित किया गया।
यदि ऐसे हालात में अविश्वास प्रस्ताव आता है तो अध्यक्ष के साथ-साथ भाजपा को नुकसान होना तय है। क्योंकि अध्यक्ष पद एससी वर्ग के लिए आरक्षित है, इस वर्ग से सिर्फ दो सदस्य है। दूसरा सदस्य कांग्रेस समर्थित है। अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और पद छोड़ना पड़ा तो कांग्रेस सदस्य को अध्यक्ष बनाना ही विकल्प रहेगा।