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May 25, 2025, 2:40 pm
KHABAR : सूर्य-चंद्रमा की रोशनी से दूरी, बच्चे हो रहे मायोपिया का शिकार, एम्स में 6 हजार बच्चों पर स्टडी, 47 प्रतिशत को दूर की चीजें दिखती हैं धुंधली, पढे़ खबर 

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भोपाल। नेचुरल लाइट यानी सूर्य और चांद की रोशनी के नीचे अब लोगों का समय कम बीत रहा है। ऐसे में उन्हें दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई देने लगी हैं। इस रोग को मायोपिया कहा जाता है। यह समस्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इस साल मायोपिया अवेयरनेस वीक (19 से 25 मई) के लिए थीम श्स्क्रीन डाउन, आइज अपश् रखी गई है।


इसका मतलब है कि व्यक्ति मोबाइल, लैपटॉप और टीवी को छोड़कर घर से बाहर खुले आसमान के नीचे समय बिताए।


मायोपिया से सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित
इससे सबसे अधिक प्रभावित बच्चे हो रहे हैं। एम्स भोपाल के नेत्र रोग विभाग द्वारा हाल ही में पांच साल तक की गई एक केस स्टडी सामने आई है। इसमें पता चला कि जिन 6,000 बच्चों को आंखों से जुड़ी समस्या थी, उनमें से 47ः बच्चों को मायोपिया था। यही नहीं, अब इस रोग को श्मायोपिया एपिडेमिकश् यानी महामारी का नाम भी दिया गया है।

विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है कि यदि जल्द सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो साल 2050 तक हर दूसरा बच्चा इससे ग्रसित होगा।


रुक रहा बच्चों की आंखों का विकास
एम्स के नेत्र रोग विभाग की प्रमुख डॉ. भावना शर्मा ने बताया कि आज हर घर में बच्चे मोबाइल, लैपटॉप और टीवी के सामने अधिक समय बिता रहे हैं। इसके कारण उनकी आंखों का वह विकास रुक रहा है, जो सामान्य रूप से 18 साल तक होता है।


आंखों की मांसपेशियां दूर और पास देखने के लिए अपनी स्थिति बदलती हैं। जब आंखों में तेज रोशनी पड़ती है तो पुतली सिकुड़ती है। लेकिन अब लंबे समय तक पास की चीजों को देखने और कृत्रिम रोशनी में रहने के कारण आंखों की मांसपेशियां एक ही स्थिति में फिक्स हो रही हैं, जिससे मायोपिया की समस्या बढ़ रही है।


जब हम सुबह या शाम की रोशनी में बाहर खेलते हैं, तो यह आंखों के लिए सबसे अनुकूल समय होता है। इसमें न रोशनी बहुत तेज होती है और न ही बहुत कम, जिससे आंखों की मांसपेशियों पर कम दबाव पड़ता है।

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