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October 26, 2025, 3:36 pm
BIG NEWS : आज़ादी के सात दशक बाद भी शासन की योजनाओं से वंचित है ये समुदाय, विमुक्त घुमन्तु व अर्द्धघुमन्त जनजाति महासंघ विद्यार्थी शाखा मंदसौर के जिलाध्यक्ष हीरालाल रेबारी ने उठाई आवाज, सरकार पर लगाए आरोप, पढ़े खबर 

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मंदसौर। देश की आज़ादी को सात दशक से अधिक हो चुके हैं, लेकिन आज भी कई समुदाय शासन की योजनाओं से वंचित हैं। इनमें सबसे उपेक्षित स्थिति विमुक्त, घुमंतु और अर्ध-घुमंतु समुदायों की है। हर वर्ष 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस मनाया जाता है। यह वही दिन है जब वर्ष 1952 में औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान लागू आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 को समाप्त कर दिया गया। यह कानून इन समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित करता था। 

विमुक्त घुमन्तु व अर्द्धघुमन्त जनजाति महासंघ विद्यार्थी शाखा मंदसौर जिलाध्यक्ष हीरालाल रेबारी (बालाहेडा ढाणी) ने बताया कि इन जातियों का इतिहास संघर्ष और पराक्रम से भरा हुआ है। विदेशी आक्रमणों से लेकर अंग्रेजी शासन तक, कभी मुगलों के खिलाफ तो कभी अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने अपनी बहादुरी दिखाई। अंग्रेज इनकी वीरता से भयभीत हुए और 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू कर दिया। इस कानून ने उन्हें अपराधी की श्रेणी में डाल दिया। स्वतंत्रता के बाद भी यह कलंक 1952 तक उनके माथे पर रहा। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रयासों से 31 अगस्त 1952 को इस कानून को समाप्त कर इन जातियों को इससे मुक्ति मिली। इतिहास के उस कलंक से मुक्ति के बाद भी आज यह समुदाय शासन की योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहा है। इसका मुख्य कारण जाति सूची में दर्ज नाम की त्रुटि है। प्रदेश की सूची क्रमांक 24 में रेभारी पशुपालक दर्ज है, जबकि राजस्व दस्तावेजों में सही नाम रेबारी है। इस मामूली से शब्दांतर ने बडी समस्या खड़ी कर दी है। कुछ क्षेत्रों में विभाग ने रेभारी पशुपालक नाम से जाति प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं, लेकिन कई स्थानों पर अधिकारी इस त्रुटि का हवाला देकर प्रमाण पत्र जारी करने से ही इंकार कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान विद्यार्थियों को हो रहा है, जिन्हें छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में आरक्षण और अन्य योजनाओं से वंचित होना पड़ रहा है। मंदसौर जिले सहित आसपास के क्षेत्रों में लगभग 40 से 50 हजार की संख्या में रेबारी जाति की जनसंख्या निवास करती है। यह समुदाय अर्ध-घुमंतु विमुक्त घुमंतु श्रेणी में आता है। इस बड़े वर्ग के भविष्य पर केवल एक शब्द की त्रुटि भारी पड रही है। 
रेबारी ने बताया कि इस समस्या को लेकर भोपाल मंत्रालय तक कई बार मांग रखी गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, पिछले वर्ष मंत्री कृष्णा गौर ने भी कहा था कि विभाग के पास इस समुदाय का सही डेटा उपलब्ध नहीं है। डेटा एकत्र कर लाभ दिलाने का आश्वासन दिया गया था, मगर वर्ष बीत जाने के बाद भी कार्यवाही आगे नहीं बढी। हीरालाल रेबारी ने भी सरकार पर आरोप लगाया कि वह सोशल मीडिया और मंचों से बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर छात्र-छात्राओं को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा। सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर डीएनटी समुदाय के भविष्य पर भारी पड़ रहा है। एक छोटे से शब्द की त्रुटि ने हजारों परिवारों और विद्यार्थियों को योजनाओं से वंचित कर दिया है। यदि शीघ्र सुधार नहीं हुआ तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। उनका कहना है कि जब तक सूची में रेभारी शब्द को सुधारकर रेबारी नहीं किया जाएगा, तब तक जाति प्रमाण पत्र बनना मुश्किल है।

 

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