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January 18, 2026, 2:09 pm
KHABAR : एमपी की जेलों में 50 प्रतिशत विचाराधीन कैदी, नेता प्रतिपक्ष उमंग बोले- सबसे अधिक आदिवासी, एनसीआरबी की रिपोर्ट में देश में एमपी तीसरे स्थान पर, पहले- दूसरे पर बिहार और यूपी, पढे़ खबर 

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भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रदेश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने पर चिंता जताई है। कहा- 50 प्रतिशत विचाराधीन कैदी में से सबसे अधिक आदिवासी है। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स (एक्स) पर लिखा-मध्य प्रदेश की 132 जेलों में देश में तीसरे सबसे अधिक 45,543 कैदी बंद हैं। पहले और दूसरे स्थान पर बिहार तथा उत्तर प्रदेश हैं।

 

कैदियों की संख्या क्षमता से 152 प्रतिशत अधिक
राज्य की जेलों की कुल क्षमता लगभग 30 हजार के आसपास है, लेकिन वर्तमान में कैदियों की संख्या क्षमता से 152 प्रतिशत अधिक है, जिससे गंभीर भीड़भाड़ की स्थिति बनी हुई है। इनमें से 22,946 कैदी यानी पूरे 50 प्रतिशत विचाराधीन (अंडरट्रायल) हैं, जिनके खिलाफ अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं या जिनकी सुनवाई चल रही है। विचाराधीन कैदियों की बात करें तो इनमें 21 प्रतिशत आदिवासी हैं-जो देश में सबसे अधिक है। इसके अलावा 19 प्रतिशत दलित और 40 प्रतिशत ओबीसी समुदाय से हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां की
इस प्रकार प्रदेश की जेलों में 80 प्रतिशत विचाराधीन कैदी आदिवासी, दलित और व्ठब् समुदाय से आते हैं। ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग न्यायिक प्रक्रिया में अधिक प्रभावित हो रहे हैं, जहां गरीबी और जमानत न जुटा पाने के कारण लंबे समय तक जेल में रहना पड़ रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों के लंबे समय तक जेल में बंद रहने पर कड़ी टिप्पणियां की हैं।


राज्य सरकारें सुधारों में उदासीन
कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। कोर्ट का कहना है कि विचाराधीन कैदी, खासकर गरीब वर्ग के लोग, सालों तक जेल में रह रहे हैं क्योंकि वे जमानत राशि जुटा नहीं पाते। 2024 में कोर्ट ने जेलों की खराब स्थिति पर नाराजगी जताई और कहा कि राज्य सरकारें सुधारों में उदासीन हैं। कई प्रदेशों में 70 प्रतिशत से अधिक कैदी विचाराधीन हैं।


कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की नियमित समीक्षा और जमानत प्रदान करने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। वहीं अगर दोषी कैदियों की बात करें तो प्रदेश में कुल लगभग 22 हजार कैदी है इसमें करीब 50 प्रतिशत आबादी आदिवासी और दलितों की है। एनसीआरबी कि प्रिजन रिपोर्ट और संसद में दिए यह आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। मेरा अनुरोध है कि सरकार और न्यायालय को मिलकर विचाराधीन कैदियों की सुनवाई शीघ्र पूरी करने, जमानत प्रक्रिया सरल बनाने तथा जेल सुधारों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

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