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February 9, 2026, 2:47 pm
KHABAR : राजनीति का यज्ञ- जब सेवा साधना बने, न कि स्वार्थ और षड्यंत्र का माध्यम, राजनीति का पहला और अंतिम उद्देश्य समाज और राष्ट्र का हित, पढे़ खबर 

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नीमच। भारतीय सभ्यता में राजनीति केवल शासन-व्यवस्था नहीं रही; वह समाज-निर्माण की एक पवित्र प्रक्रिया रही है। यहाँ राजनीति को सत्ता की सीढ़ी नहीं, बल्कि यज्ञ माना गया-ऐसा यज्ञ जिसमें व्यक्ति अपने निजी हित, अहंकार और लाभ की आहुति देकर समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए कार्य करता है।

 

“प्रजा सुखे सुखं राज्ञः” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं था, बल्कि राजनीति का मूल दर्शन था। राजनीति का अर्थ था-संयम, त्याग, उत्तरदायित्व और लोककल्याण। लेकिन आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति अब भी उसी भावना से संचालित हो रही है?


मूल उद्देश्य से विचलन
राजनीति का पहला और अंतिम उद्देश्य समाज और राष्ट्र का हित होना चाहिए। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करना उसका दायित्व है। जब राजनीति समाज को जोड़ती है, तब राष्ट्र मजबूत होता है। परंतु जब वही राजनीति स्वार्थ और सत्ता के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, तब अविश्वास और विघटन जन्म लेते हैं।


आज की सबसे बड़ी विकृति व्यक्ति-केंद्रित राजनीति है। विचारधारा और संगठन से बड़ा स्वयं को मान लेना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध है। निर्णय अनुकूल हों तो अनुशासन की बात, और विपरीत हों तो आरोप-प्रत्यारोपकृयह प्रवृत्ति राजनीति को प्रदूषित करती है।


असहमति और षड्यंत्र की रेखा
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है। लेकिन असहमति यदि संवाद और मर्यादा में रहे, तो वह व्यवस्था को मजबूत करती है। जब वही असहमति स्वार्थवश षड्यंत्र, भ्रम और विघटन का रूप ले लेती है, तब वह लोकतंत्र को कमजोर कर देती है।


स्वार्थ और परिवारवाद
राजनीति और स्वार्थ का सह-अस्तित्व संभव नहीं। स्वार्थ से प्रेरित राजनीति संगठन को भीतर से खोखला करती है। इसी प्रकार, जब राजनीति सेवा से हटकर परिवारवाद या व्यवसाय बन जाती है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। योग्यता और त्याग की जगह संबंधों को प्राथमिकता देना सामाजिक न्याय के विपरीत है।


समाज को बाँटने की प्रवृत्ति
जाति, वर्ग, भाषा या भावनाओं के आधार पर समाज को विभाजित कर वोट हासिल करना राजनीति का सबसे खतरनाक रूप है। यह राष्ट्रनिर्माण नहीं, राष्ट्रविघटन है।


आत्ममंथन की आवश्यकता
जो संगठन स्वयं को राष्ट्रनिर्माण का वाहक मानते हैं, उनके लिए आत्मशुद्धि अनिवार्य है। अनुशासनहीनता और स्वार्थ को सहन करना संगठन की जड़ों को कमजोर करता है। संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। यदि कोई व्यक्ति मंच और पहचान का उपयोग निजी हित के लिए करता है, तो उसे रोकना कठोरता नहीं, बल्कि आत्मरक्षा है।


युवा और राजनीति का भविष्य
आज का युवा राजनीति से इसलिए दूर हो रहा है क्योंकि उसे उसमें आदर्श नहीं, अवसरवाद दिखाई देता है। यदि राजनीति मूल्यनिष्ठ होगी, तो युवा उससे जुड़ेगा; अन्यथा यह दूरी राष्ट्र के लिए चिंता का विषय बनेगी।


निष्कर्ष
आज आवश्यकता है राजनीति के पुनर्जागरण कीकृऐसी राजनीति की जो सेवा-प्रधान हो, संयमित हो और राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखे। राजनीति यदि यज्ञ बनेगी, तो राष्ट्र सशक्त होगा; यदि वह स्वार्थ का साधन बनी, तो समाज बिखरेगा।

अंततः-
राजनीति जनता के लिए होती है, जनता राजनीति के लिए नहीं।

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