उज्जैन। धुलेंडी के साथ ही पारंपरिक गणगौर पूजा की शुरुआत हो गई है। अविवाहित और विवाहित महिलाएं 16 दिनों तक प्रतिदिन सुबह-शाम गणगौर और ईश्वर जी की पूजा-अर्चना करेंगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणगौर को भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है।
अविवाहित लड़कियां अच्छे वर और सुखी परिवार की कामना से यह पूजा करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और घर की शांति के लिए गणगौर की आराधना करती हैं।
8 साल की उम्र से कर रहीं पूजा
भार्गव नगर निवासी पूर्वा व्यास ने बताया कि वह 8 साल की उम्र से गणगौर पूजा कर रही हैं और आज भी अपनी मम्मी और भाभी के साथ यह परंपरा निभाती हैं। उनका परिवार मूल रूप से राजस्थान से जुड़ा है और वे इस पूजा को राजस्थानी परंपरा के अनुसार करते हैं।
पूर्वा ने यह भी बताया कि गणगौर पूजा की कई अलग-अलग विधियां होती हैं। कुछ स्थानों पर पूजा के दौरान पुरुषों को देखने की अनुमति नहीं होती, जबकि अन्य स्थानों पर सामान्य रूप से सभी लोग पूजा में शामिल हो सकते हैं।
मूर्तियों के लिए बीकानेर से आती हैं पोशाक
उनके घर में गणगौर जी, ईश्वर जी और भाया जी की विशेष लकड़ी की मूर्तियां हैं, जिन्हें खास ड्रेस और जेवरों से सजाया जाता है। हर साल राजस्थान के बीकानेर से विशेष पोशाकें बनवाई जाती हैं। उनके पास 15 से अधिक पोशाकें हैं।
पूजा के दौरान प्रतिदिन सुबह-शाम भगवान को नहलाकर फूल-माला, नए कपड़े और आभूषण पहनाए जाते हैं, जिसमें लगभग एक-दो घंटे का समय लगता है। इसके बाद भजन, गीत और आरती की जाती है। शीतला सप्तमी से समाज की अनेक फूलपाती भी निकाली जाती हैं, जिसमें दूल्हा-दुल्हन बनकर नाचते-गाते हुए निकलते हैं।
पूर्वा ने बताया कि शाम को कलश में अंगूठी या नए रूमाल के माध्यम से गणगौर और ईश्वर जी को जल अर्पित किया जाता है।