जीरन। कहते हैं कि राजनीति में शुचिता और शिष्टाचार की अपनी जगह होती है, लेकिन जीरन नगर परिषद ने जो किया है, उसने विकास की राजनीति पर श्सियासी कालिखश् पोत दी है। सामुदायिक भवन में लगे एक स्वागत बोर्ड को लेकर पूरे क्षेत्र में बवाल मचा हुआ है। बोर्ड पर न तो क्षेत्रीय सांसद सुधीर गुप्ता का नाम है और न ही विधायक दिलीप सिंह परिहार का। चर्चा गर्म है कि क्या कांग्रेस शासित नगर परिषद इतनी संकीर्ण मानसिकता पर उतर आई है कि वह सरकारी प्रोटोकॉल और शिष्टाचार को भी भूल गई?
नगर परिषद द्वारा लगाए गए इस स्वागत बैनर से भाजपा समर्थित दोनों दिग्गज जनप्रतिनिधियों को गायब कर दिया गया है। स्थानीय लोगों और राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा का विषय है कि परिषद केवल अपनी विचारधारा को चमकाने में लगी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक बैनर पर फोटो न लगाने से इन जनप्रतिनिधियों का कद कम हो जाएगा? या फिर यह परिषद की अपमानजनक कार्यप्रणाली का एक हिस्सा है?
हैरानी की बात तो यह है कि एक तरफ जहाँ नगर परिषद में कांग्रेस का कब्जा है, वहीं दूसरी तरफ सांसद और विधायक ने विकास कार्यों में कभी पार्टी लाइन को बीच में नहीं आने दिया। विधायक और सांसद निधि से बिना किसी भेदभाव के दो-दो डोम स्वीकृत किए गए। प्रदेश की भाजपा सरकार ने नगर अधोसंरचना के तहत करोड़ों के सड़क निर्माण की मंजूरी दी। विडंबना यह है कि जिनके फंड से नगर की सड़कें चमक रही हैं और सामुदायिक भवनों में डोम बन रहे हैं, परिषद के पास उन्हीं के लिए बोर्ड पर दो इंच की जगह नहीं बची!
जीरन के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि विकास के लिए बजट लेते समय तो परिषद को सांसद-विधायक अच्छे लगते हैं, लेकिन जब सम्मान देने की बारी आती है, तो कांग्रेसी चश्मा हावी हो जाता है। यह कृत्य न केवल जनप्रतिनिधियों का अनादर है, बल्कि जीरन की जनता के विवेक का भी अपमान है। सवाल यह खड़ा होता हैं कि क्या जीरन नगर परिषद विकास के नाम पर केवल श्रेय की राजनीति करना चाहती है?