चित्तौड़गढ़। भारतीय ऋतुचक्र में “नोतपा” केवल अत्यधिक गर्मी का काल नहीं, बल्कि शरीर, प्रकृति और स्वास्थ्य के गहन संबंध को समझने का महत्वपूर्ण समय है। ज्येष्ठ मास में जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब पृथ्वी पर तापमान अपने चरम पर होता है। यही काल लोकजीवन में “नोतपा” कहलाता है, जो सामान्यतः नौ दिनों का होता है। आधुनिक विज्ञान इसे हीट वेव कहता है, जबकि आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पूर्व ही इसके प्रभावों का विस्तृत वर्णन किया है।
आयुर्वेद में नोतपा का स्वरूप-
श्रीकल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य महेश दीक्षित ने बताया कि आयुर्वेद के अनुसार यह ग्रीष्म ऋतु का चरमकाल है, जिसे “आदान काल” कहा गया है। इस काल में सूर्य की तीव्रता शरीर की शक्ति, ओज और स्निग्धता को क्षीण करती है। इस समय पित्त दोष बढ़ता है, वात का संचय होता है तथा कफ घटता है। इससे रूक्षता, कमजोरी, प्यास, थकान, चिड़चिड़ापन एवं नेत्र दाह जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
शरीर पर प्रभाव-
नोतपा के दौरान जठराग्नि मंद पड़ जाती है, जिससे भारी एवं तीक्ष्ण भोजन हानिकारक होता है। इस ऋतु में लू लगना, निर्जलीकरण, अम्लपित्त, सिरदर्द, अनिद्रा और त्वचा शुष्कता जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
ऋतुचर्या अनुसार जीवनशैली-
विहार: दोपहर 11 से 4 बजे तक धूप से बचना, हल्के सूती वस्त्र पहनना, सिर ढककर निकलना, अधिक श्रम से बचना तथा प्रातःकाल योग-प्राणायाम करना लाभकारी है।
आहार: शीतल, मधुर, द्रव एवं स्निग्ध पदार्थ जैसे बेल शरबत, आम पन्ना, सत्तू, छाछ, नारियल पानी, तरबूज आदि का सेवन करना चाहिए।
क्या न खाएं: अधिक मिर्च-मसाले, तला भोजन, शराब, अधिक चाय-कॉफी एवं बासी भोजन से बचना चाहिए।
आयुर्वेदिक पेय एवं उपाय-
आम पन्ना, सत्तू, धनिया-मिश्री जल, जौ की राब, खस जल आदि शरीर को शीतलता एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं। चंदन लेप, नारियल तेल से अभ्यंग तथा गुलाब जल से नेत्र प्रक्षालन लाभकारी हैं।
योग एवं प्राणायाम-
शीतली एवं शीतकारी प्राणायाम शरीर की गर्मी कम करते हैं, पित्त दोष को नियंत्रित करते हैं तथा मानसिक शांति प्रदान करते हैं।
लोक परंपराएँ और जीवन व्यवहार-
मिट्टी के घड़े का जल, छाछ-सत्तू का सेवन, प्याऊ लगाना, पशु-पक्षियों के लिए जल व्यवस्था जैसी परंपराएँ वास्तव में आयुर्वेदिक जीवनशैली का ही हिस्सा हैं।
निष्कर्ष-
नोतपा का काल केवल तप का नहीं, बल्कि संतुलन और स्वास्थ्य संरक्षण का अवसर है। आयुर्वेद हमें सिखाता है कि प्रकृति के अनुरूप जीवन ही आरोग्य का आधार है। ग्रीष्म ऋतु में सही आहार-विहार अपनाकर शरीर, मन और ओज की रक्षा की जा सकती है।