रायसेन। शासकीय सांदीपनी स्कूल में बुधवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई गई। इस मौके पर बच्चों ने माखन मटकी फोड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। छोटे-छोटे बच्चे राधा-कृष्ण के रूप में तैयार होकर स्कूल पहुंचे और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मंचन किया। बच्चों की प्रस्तुतियों ने सभी का मन मोह लिया।
बच्चों को श्रीकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं की जानकारी दी
कार्यक्रम में स्कूल के प्राचार्य एलएन प्रधान और प्रधानाध्यापक सूर्य प्रकाश सक्सेना ने बच्चों को श्रीकृष्ण के जीवन, उनके स्वभाव और शिक्षाओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण सिर्फ एक धार्मिक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, नियम, काम और धर्म के बड़े प्रतीक हैं। बच्चों को उनके जीवन से जुड़े मूल्यों और सीख के बारे में भी बताया गया।
महर्षि संदीपनी और श्रीकृष्ण की शिक्षा पर बताया
बच्चों को महर्षि संदीपनी के बारे में भी जानकारी दी गई। पुरानी मान्यताओं के अनुसार महर्षि संदीपनी का आश्रम वर्तमान उज्जैन में था। वे वेद, शास्त्र, राजनीति और कई कलाओं के जानकार थे। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा को उनका खास शिष्य माना जाता है।
64 दिनों में सीखी थीं 64 कलाएं और 14 विद्याएं
कार्यक्रम में बताया गया कि श्रीकृष्ण और बलराम ने महर्षि संदीपनी के आश्रम में 64 दिनों में 64 कलाएं और 14 विद्याएं सीखी थीं। शिक्षा पूरी होने के बाद श्रीकृष्ण ने गुरु दक्षिणा के रूप में महर्षि संदीपनी के बेटे को वापस लाकर अपनी गुरु भक्ति का परिचय दिया।
श्रीकृष्ण को सिर्फ माखन चोर मानना गलत
प्रधानाध्यापक सूर्य प्रकाश सक्सेना ने श्रीकृष्ण से जुड़ी कुछ गलत धारणाओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण को सिर्फ माखन चुराने वाले बच्चे के रूप में देखना उनके बड़े व्यक्तित्व को कम आंकना है। उनकी बचपन की लीलाएं प्रेम और खुशी का प्रतीक हैं।
अन्याय के विरोध और धर्म की स्थापना का संदेश
प्रधानाध्यापक ने बताया कि श्रीकृष्ण ने लड़ाई को बढ़ावा देने के बजाय धर्म की स्थापना और अन्याय के विरोध का संदेश दिया। महाभारत में उन्होंने शांति के लिए प्रयास किए। हालात बिगड़ने पर उन्होंने धर्म की रक्षा का रास्ता दिखाया। उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन में नियम, दोस्ती, नेतृत्व, फर्ज और काम के महत्व को भी बच्चों को समझाया।
रासलीला को भक्ति से जोड़कर समझाया
कार्यक्रम में विद्यार्थियों को बताया गया कि रासलीला को केवल सांसारिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। भक्ति परंपरा में इसे ईश्वर और भक्त के आध्यात्मिक संबंध के प्रतीक के रूप में समझा जाता है। बच्चों को श्रीकृष्ण के मूल संदेश धर्म का पालन, अन्याय का विरोध, कर्तव्य के प्रति निष्ठा और कर्म में विश्वास के बारे में बताया गया।
बच्चों में धार्मिक और नैतिक मूल्यों का संदेश
स्कूल परिसर में आयोजित कार्यक्रम के जरिए विद्यार्थियों को श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी शिक्षाओं से जुड़े धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की जानकारी दी गई। जन्माष्टमी के आयोजन में बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को प्रस्तुत किया।