चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री ने कहा कि संसार में रहते हुए अपने कार्यों, दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वहन करें, लेकिन उनके प्रति आसक्ति का भाव नहीं रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, धन-संपत्ति और शरीर के प्रति मोह व्यक्ति को बांधता है।
महासती पूर्वीश्री ने नंदन मनियार का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने एक बावड़ी बनवाई और उसके प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण अगले जन्म में उसी बावड़ी में मेंढक बने। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि आसक्ति किस प्रकार व्यक्ति को बांध सकती है। संसार में रहते हुए संयोग-वियोग में विचलित नहीं होना चाहिए। जैसे-जैसे अनासक्त भाव बढ़ता है, वैसे-वैसे संलेखना और संथारा की साधना भी सहज होती जाती है।
उन्होंने भोजन में भी आसक्ति नहीं रखने की बात कही। भोजन केवल शरीर को चलाने के लिए करना चाहिए, रसास्वादन के लिए नहीं। उन्होंने उनोदारी तप का महत्व बताते हुए कहा कि भूख से कुछ कम भोजन करने की आदत शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी है। इससे तपस्या आसान होती है और मनोबल भी मजबूत होता है। उन्होंने कहा कि मन की इच्छा से नहीं, बल्कि मजबूत मनोबल के साथ जीवन जीना चाहिए, तभी तप में आनंद की अनुभूति होगी।
धर्मसभा को महासती सुश्रीया ने भी संबोधित किया। उन्होंने प्रतिलेखना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए साधना, आराधना और संवर की विधि को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि प्रतिलेखना के दौरान खुले मुंह से बात नहीं करनी चाहिए। मुंहपत्ती का पलेवन करते समय मौन रहना आवश्यक है, जिससे अहिंसा की साधना प्रभावी रूप से हो सके।
महासती पूर्वीश्री ने मार्मिक भजन के माध्यम से संदेश दिया कि भोगना सरल है, लेकिन तप और त्याग के लिए मन को मोड़ना कठिन है। इसके लिए व्यक्ति को अपना मनोबल मजबूत करना चाहिए।
धर्मसभा में मंजू अंबानी, रंजना चंडालिया, कविता मोदी, रेखा नागौरी, महिला समिति अध्यक्ष सरोज सुराणा एवं समता बहू मंडल द्वारा तप अनुमोदन गीत और भाव प्रस्तुत किए गए। पारस चंडालिया के लगातार 29वें एकासन तप के प्रत्याख्यान हुए। इसके साथ ही 24 घंटे मौन, 24 घंटे मोबाइल त्याग, आयंबिल, एकासन, उपवास, तेला सहित विभिन्न तप के प्रत्याख्यान महासती द्वारा कराए गए और मंगल पाठ सुनाया गया।
कार्यक्रम का संचालन संघ अध्यक्ष शंकर सुराणा ने किया।