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January 14, 2023, 5:53 pm
NEWS : राजयोगिनी आशा दीदी जी ने कहा- मकर सक्रांति का आध्यात्मिक रहस्य है, आज के दिन विभिन्न नदियों के घाटों पर लगता है लाखों श्रद्धालुओं का मेला, पढ़े रेखा खाबिया की खबर 

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चित्तौड़गढ़। मकर सक्रांति पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं का मेला विभिन्न नदियों के घाटों पर लगता है इस दिन तिल खिचड़ी का दान करते हैं वास्तव में स्थूल परंपराओं में आध्यात्मिक रहस्य छुपे हुए हैं। यह विचार ब्रम्हाकुमारी प्रताप नगर सेवा केंद्र पर राजयोगिनी आशा दीदी जी ने मकर सक्रांति का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए उन्होंने कहा कि अभी कलयुग का अंतिम समय चल रहा है सारी मानवता दुखी अशांत है हर कोई परिवर्तन के इंतजार में हैं सारी व्यवस्था व मनुष्य की मनोदशा जीर्ण शीर्ण हो चुकी है ऐसे समय में विश्व सृष्टिकर्ता परमात्मा ज्योति स्वरूप शिव कलयुग और सतयुग के संधि काल अर्थात संगम युग पर ब्रह्मा के तन मैं आ चुके हैं जिस प्रकार भक्ति मार्ग में पुरुषोत्तम मास में दान पुण्य आदि का महत्व होता है उसी प्रकार इस पुरुषोत्तम संगम युग जिसमें ज्ञान स्नान करके बुराइयों का दान करने से पुण्य का खाता जमा करने वाली हर आत्मा उत्तम पुरुष बन सकती है इस दिन जो खिचड़ी और तिल का दान करते हैं इसका भाव यह है कि मनुष्य के संस्कारों में आसुरी संस्कारों की मिलावट हो चुकी है अर्थात उसके संस्कार खिचड़ी हो चुके हैं जिन्हें परिवर्तन करके अब दिव्य संस्कार धारण करने हैं इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य को ईर्ष्या द्वेष आदि संस्कारों को छोड़कर संस्कारों का मिलन इस प्रकार करना होगा जिस प्रकार खिचड़ी मिलकर एक हो जाती है परमात्मा कि अभी आज्ञा है कि तिल सामान अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म बुराइयों को भी हमें तिलांजलि देना है जैसे उस गंगा में भाव  को भाव से जोर जबरदस्ती से एक दो को नहला कर खुश होते और शुभ मानते इसी प्रकार अब हमें ज्ञान गंगा में नहला कर मुक्ति जीवन मुक्ति का मार्ग दिखाना है जैसे जब नई फसल आती है तो सभी खुशियां मनाते हैं इसी प्रकार वास्तविक और अविनाशी खुशी प्राप्त होती है बुराइयों का त्याग करने से सतयुग मैं खुशी का आधार अभी का संस्कार परिवर्तन है यह त्यौहार संगम युग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार में मनाया जाता है सर्वप्रथम स्नान करना तो ब्रह्म मुहूर्त में उठना ज्ञान स्नान का यादगार है दूसरा तिल खाना खिलाना दान करने का भी रहस्य है तो वास्तव में छोटी चीज की तुलना तिल से की गई है आत्मा भी अति सूक्ष्म है अर्थात तिल आत्मस्वरूप में टिकने का यादगार है तीसरा पतंग उड़ाना तो आत्मा हल्की हो तो उड़ने लगती हैं देहा भान वाला उड़ नहीं सकता चौथा तिल के लड्डू खाना तिल को अगर खाओ तो कड़वा महसूस होता है अर्थात अकेले में भारीपन का अनुभव होता है लड्डू एकता और मिठास का भी प्रतीक है पांचवा तिल का दान दान देने से भाग्य बनता है वर्तमान संगम युग में हमें परमात्मा को अपनी छोटी कमजोरी का भी ध्यान देना है और उन्होंने बताया छठवां आग जलाना अग्नि में डालने से चीजें पूरी तरह बदल जाती है जब हम सामूहिक रूप में संगठित रूप में एक ईश्वर की स्मृति में रहते हैं तो हमारे मन से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा जमा होती है जो हमें जीवन में सदा हल्का रखती है सदा खुश रखती है इसी प्रकार सभी को मकर सक्रांति की बधाई देते हुए सभी भाई बहनों से यही संकल्प कराया कि हम छोटी से छोटी बातों को अपने मन में ना पकड़े और किसी की बुराई को चित्र पर ना रखें इसका दान करें ज्ञानदान के साथ-साथ गुणों का दान अवश्य करें।

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