चित्तौड़गढ़। धर्म बचा रहना चाहिये उससे ही हमारी रक्षा होगी। लेकिन सवाल उठाता है कि धर्म को बचाएंगे कैसे , गाय के दूध और आकड़े के दूध का रंग एक जैसा होता है लेकिन जब तक उसकी पहचान नहीं हो जाती, उसके उपयोग से प्राण भी जा सकते हैं। गाय का दूध अमृत है तो आकडे का दूध जहर।
उक्त बात जैनाचार्य श्री रामेश ने निम्बाहेडा आदर्श कॉलोनी स्थित समता भवन में शुक्रवार को अपनी अमृत देशना में फरमाते हुए कही। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें धर्म और अधर्म के भेद को जान लेना चाहिये। मुनि अवस्था में भी क्रोध, मान, माया, लोभ सभी हो सकते है। जब इन सभी से आत्मा विरक्त हो जाए तो आत्मा वीतरागी बन जाती है। उन्होंने माया शब्द की व्याख्या करते हुए बतलाया कि छल कपट आदि क्रियाएं सभी माया के ही रूप है। माया मित्रता का नाश करती है जबकि धर्म सभी के प्रति मैत्री भाव सिखाता है। भाई भाई में इर्ष्या व बंटवारा हो सकता है लेकिन मित्रता मे नहीं छद्मस्त अवस्था में अच्छाई और बुराई दोनों होती है और यही उसकी कमजोरी व कमी है। धर्म प्राणी मात्र के साथ हमें मैत्री भाव रखने की बात बताता है। माया, छल, कपट आदि सभी हमारी मित्रता के दूश्मन है। जो मित्रता का वमन करता है वह ज्ञान का अधिकारी नहीं होता क्योंकि ज्ञान पाने के लिये सरलता होना चाहिये। भोजन यदि पच जाऐ तो वह पोष्टीक हो जाता है ओैर उसके रस से सात धाूतओं में परिवर्तत होकर शरीर को मजबुती प्रदान करता है। वहीं भोजन नहीं पचे तो शरीर में जहर का काम करता है, आलस्य ओर बीमारी को जन्म देगा।
उन्होंने बताया कि साधना और सिद्वि नजरो में होगी वह निर्ग्रन्थ होता है। जिस प्रकार से अर्जून की साधना तीर की नोक व उसका साध्य मछली की आंख था तो सरलता से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया था। हमें भी अपना लक्ष्य प्राप्त करना है तो हमे अपने जीवन में ऋजुदर्शीता यानी सरलता लानी होगी, तभी हम मोक्षगामी हो सकते है। साधु का कोई स्थाई पता नहीं होता क्योंकि उसका मुल पता मोक्ष पाना है। इसलिये उसका कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता, साधु चाहे विहार कर रहे है, गोचरी कर रहे है, या धार्मिक क्रिया कर रहे है हर स्थिति में उनको अपना लक्ष्य ध्यान में रखना चाहिये। किसी महत्वपूर्ण स्थान पर लगी मेटल डिडेक्टर मशीन एक छोटी सी आलपीन को भी दर्शीत कर देता है और आपको उस स्थान पर जाने से वंचित कर सकती है। ठीक उसी प्रकार आत्मा में रहा छोटा सा छल-कपट भी हमारी आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर जाने से रोकने वाला बन जाता है और वही छल कपट आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराने के वाला बन जाता है।
उन्होंने कहा सरलता चली गई तो मुनित्व का टिकना बहुत ही मुश्किल है। माया हमारी आत्मा को मिथ्यात्व की ओर ले जाने वाली होती हैं। जीवन में जितनी गांठे होगी संसार उतना ही मजबुत बनेगा हमें संसार को मजबुत करना है या हमारी आत्मा को यह विचार करना चाहिये। हमें हमारी आत्मा को मजबुत करना है तो भगवान ने फरमाया है कि माया पर चोंट करो, अपनी आवश्यकताएं, अपेक्षाऐं कम करेंगे तो जीवन में सरलता आएगी जिससे हम शान्ति का जीवन जी सकेंगे। भगवान महावीर क्रोध, मान, माया और लोभ का वमन करने वाले थे और इसी के चलते मोक्षगामी हुऐ, उन्होने फरमाया अपनी शक्ल के साथ साथ हमें अपनी आत्मा को भी आईने में देखना चाहिये जिससे हमारे दोष हमेें दिख सके क्योकि बिना सरलता के धर्म की रक्षा होना मुश्किल है, धर्म कम करे लेकिन क्वालीटी का करें सामायिक एक करें लेकिन पुण्या श्रावक जेसी करें जिसकी कीमत कोई लगा नही सकेे। सांप चाहे कितना भी टेड़ा मेड़ा चले लेकिन बिल में जाते वक्त बिल्कुल सीधा व सरल हो जाता है। इसलिये तरह आत्मा को सरल बनाऐगें तो धर्म की रक्षा अपने आप होगी और धर्म की रक्षा होगी तो हमारी अभिरक्षा होगी ओर हमारी आत्मा मोक्षगामी बनेगी।