चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में जिज्ञासुओं के समक्ष चातुर्मासिक प्रवचन करते हुए शांतक्रांति संघ की विदूषी महासती शीलप्रभा ने कहा कि पिछले अनंत भवों में धीरे धीरे हमने दुखों को सहन करते हुए मनुष्य जन्म पाने जितनी पुन्यवानी अर्जित की जिसकी बदौलत आज़ हमें दुर्लभ मानव जन्म मिला है और आर्य क्षैत्र मिलने के साथ उत्तम कुल भी नसीब हुआ है। हमें पांचों इंद्रियां भी पूर्ण रूप से मिलने के साथ निरोगी काया का उपहार भी मिला है और चारित्र आत्माओं के सानिध्य एवम् सामिप्य का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है तथा जिनवाणी श्रवण का अवसर भी हमारे लिए सुलभ हुआ है। साथ ही धर्म सुनना रुचिकर एवम प्रियकर भी लग रहा है। अब हमें चाहिए कि हम अपने अंतर में जिन धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा एवम् विश्वास पैदा करते हुए प्रभु आज्ञा अनुसार आचरण करने का पुरुषार्थ करते हुए अपनी आत्म जागृति के माध्यम से अज्ञान एवम् मिथ्यात्व रूपी अंधकार को हटाने में सफलता प्राप्त करने की दिशा कदम बढ़ाएं।
इससे पूर्व साध्वी सत्यप्रभा ने कहा कि तीर्थंकरों द्वारा प्ररूपित जिनवाणी श्रवण करने के लिए देवलोक के देवता भी तरसते हैं। जिनवाणी के एक एक शब्द को समझ पूर्वक सुनने से अनन्त अशुभ कर्मो की निर्जरा होती है अतः हमें चाहिए कि हम जिन वचनों को श्रद्धा के साथ सुन कर उनको अपने आचरण में लाते हुए आत्महित की दिशा में आगे बढ़ते रहें। महासती पुण्यप्रिया ने ठानांग सूत्र के छटे ठाणे में वर्णित अवधि ज्ञान के विषय मे जानकारी दी। साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा ने विभिन्न प्रत्याख्यान कराने के बाद मंगल पाठ सुनाया। संचालन संघ मंत्री इंद्रेश कोठारी ने किया।