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August 8, 2026, 10:21 am
KHABAR : मनासा के उषा गंज स्थित श्रीराम मंदिर परिसर में 15 दिवसीय श्रीराम कथा का आयोजन, कथावाचक गिरधर स्वामी ने कहा- दस सिर वाला रावण भी नहीं बच सका, एक गलत कदम ने शुरू कर दिया उसके विनाश का सफर, पढ़े बद्रीलाल गुर्जर की खबर

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मनासा। श्रीराम कथा के बारहवें दिवस सीताहरण प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए जयपुर से पधारे कथावाचक श्री गिरधर स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य जैसे ही कुमार्ग पर कदम रखता है, उसका विवेक, बुद्धि और तेज धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है। इसलिए जीवन में सद्मार्ग और सत्संग का महत्व अत्यंत आवश्यक है।

मनासा उपागंज स्थित श्रीराम मंदिर परिसर में आयोजित 15 दिवसीय श्रीराम कथा के दौरान स्वामी जी ने किष्किंधा कांड के प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम दो नारियों से मिले—एक भक्त शबरी और दूसरी राक्षसी शूर्पणखा। शबरी भगवान के प्रति भक्ति एवं समर्पण लेकर आई थी, जबकि शूर्पणखा आसक्ति और अहंकार से प्रेरित थी। भक्ति का पहला नियम है कि शरणागत भक्त स्वयं को प्रभु का दास मानता है, जबकि शूर्पणखा भगवान से बराबरी करने लगी।

खर-दूषण के वध के बाद रावण को उकसाया

स्वामी जी ने बताया कि शूर्पणखा के नाक-कान कटने के बाद वह अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुंची। भगवान श्रीराम ने युद्ध में खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षसों का संहार कर दिया। इसके बाद शूर्पणखा रावण के पास पहुंची और उसे बदला लेने के लिए उकसाया।

रावण अपने मायावी मामा मारीच के पास गया। मारीच भगवान श्रीराम के पराक्रम से भली-भांति परिचित था। उसने रावण को श्रीराम से बैर न करने की सलाह दी, लेकिन रावण के दबाव में उसे स्वर्ण मृग का रूप धारण करना पड़ा। स्वर्ण मृग के पीछे भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के कुटिया से दूर जाने के बाद रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।

कुमार्ग पर चलते ही समाप्त होने लगता है विवेक

स्वामी जी ने चौपाई के माध्यम से प्रसंग का भाव समझाते हुए कहा—

“सो दस सीस स्वान की नाई।
इत उत चितइ चला भड़िहाई॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा।
रह न तेज तब बुद्धि लेसा॥”

उन्होंने कहा कि काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं कि कुमार्ग पर कदम रखते ही मनुष्य का तेज, बुद्धि और विवेक क्षीण होने लगता है। त्रिलोक विजयी रावण भी जब कुमार्ग पर चला तो उसका पतन निश्चित हो गया। इसलिए मनुष्य को गलत मार्ग पर बढ़ने से पहले ही सचेत हो जाना चाहिए।

अच्छी संगति जीवन को सद्मार्ग की ओर ले जाती है

कथा में भगवान श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि सुग्रीव का जीवन भय से प्रभावित था। वह बाली के भय से छिपकर रहता था और कई परिस्थितियों में भय के कारण पीछे हट जाता था। इसके बावजूद उसके साथ हनुमान जी जैसे भक्त और संत का संग था।

उन्होंने कहा कि सुग्रीव कुछ समय के लिए सीता जी की खोज के दायित्व को भूलकर राजसी सुख-सुविधाओं में रम गया था, लेकिन अच्छी संगति के कारण उसे भगवान श्रीराम का सानिध्य और मैत्री प्राप्त हुई। सत्संग का यही प्रभाव है कि वह मनुष्य को कुमार्ग से हटाकर सद्मार्ग की ओर ले जाता है।

कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। “बोले पिंजरे का तोता राम” भजन के बाद भगवान श्रीराम की आरती की गई। इसके पश्चात प्रसाद वितरण के साथ श्रीराम कथा के बारहवें दिवस का समापन हुआ।

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