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January 4, 2026, 3:33 pm
KHABAR : इंदौर त्रासदी ने खोली सत्ता की संवेदनहीनता, मौतों के बाद भी नहीं हिली कुर्सियां, जवाबदेही तय करने के बजाय एक-दूसरे पर डाली जा रही जिम्मेदारी, पढ़े शब्बीर बोहरा की खबर 

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मनासा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की बात वर्तमान दौर में लगभग बेमानी होती जा रही है। आज की राजनीति में श्रेय लेने की होड़ तो दिखती है, लेकिन जब जवाबदेही और नैतिक दायित्व निभाने की बात आती है, तब अधिकांश जनप्रतिनिधि पीछे हटते नजर आते हैं। उपलब्धियों का श्रेय लेने और अपनी महिमा का बखान कराने में नेता अग्रणी रहते हैं, किंतु असफलताओं और त्रुटियों की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं होता।

ऐसा दौर भी स्मृति पटल पर उभरता है जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे नेता भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे। उस समय राजनीतिक शुचिता और नैतिकता को सर्वाेच्च स्थान दिया जाता था। बाबरी ढांचा प्रकरण में मुकदमा दर्ज होने के बाद श्रद्धेय लालकृष्ण आडवाणी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया था, वहीं कर्नाटक में प्रकरण दर्ज होने पर उमा भारती ने मुख्यमंत्री जैसे सर्वाेच्च पद से इस्तीफा देकर राजनीति में नैतिकता की मिसाल कायम की थी। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्होंने शुचिता की राजनीति को मजबूत आधार प्रदान किया।

नैतिकता का यह प्रसंग इसलिए भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि इंदौर जैसे महानगर में दूषित पेयजल के सेवन से अनेक नागरिकों की असामयिक मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। जनप्रतिनिधि इसे प्रशासनिक चूक बता रहे हैं, जबकि प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी स्वीकारने से बचते नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इतनी निर्दाेष जानें किसकी लापरवाही से गईं और इसका उत्तरदायी कौन है?

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिम्मेदारी और नैतिकता को फुटबॉल की तरह एक-दूसरे के पाले में उछाला जा रहा है। अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए त्यागपत्र देना उचित नहीं समझा। यह स्थिति राजनीति में लगातार हो रहे नैतिक पतन की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है और जनविश्वास को कमजोर करने वाली है।

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