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February 22, 2026, 3:05 pm
KHABAR : नीमच में 507 गिद्धों की गणना, तीन प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज, संरक्षण प्रयासों से बढ़ी संख्या, पढे़ शब्बीर बोहरा की खबर 

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नीमच। प्रदेश में गिद्धों की संख्या और उनकी स्थिति का आकलन करने के उद्देश्य से नीमच जिले में 20, 21 और 22 फरवरी को तीन दिवसीय शीतकालीन गिद्ध गणना अभियान चलाया गया। वन मंडलाधिकारी एस.के. अटोदे के मार्गदर्शन और एसडीओ फॉरेस्ट दशरथ अखंड के नेतृत्व में वन विभाग की टीम ने यह गणना की।


इस बार पहली बार गणना मोबाइल ऐप के माध्यम से दर्ज की गई। नीमच, मनासा, रामपुरा, जावद और रतनगढ़ वन रेंज सहित जिले के राजस्व क्षेत्रों में किए गए सर्वे में कुल 507 गिद्ध पाए गए। गणना के दौरान मध्यप्रदेश में पाई जाने वाली सात प्रजातियों में से तीन प्रजातियांकृइजिप्टियन गिद्ध, व्हाइट-रम्प्ड वल्चर (सफेद पीठ वाला) और इंडियन लॉन्ग-बिल्ड वल्चरकृकी उपस्थिति दर्ज की गई।


उपवन मंडलाधिकारी दशरथ अखंड ने बताया कि गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी हैं, जो मृत पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं। पशुपालकों द्वारा दर्दनिवारक दवा डिक्लोफेनेक के उपयोग के कारण इनकी संख्या पहले तेजी से घटी थी, जिससे यह विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए थे। हालांकि वन विभाग के लगातार संरक्षण प्रयासों से अब हर वर्ष इनकी संख्या में वृद्धि दर्ज हो रही है।


गणना सूर्याेदय से सुबह 9 बजे तक की गई, जिसमें केवल पेड़ों या चट्टानों पर बैठे गिद्धों को ही गिना गया, उड़ते हुए गिद्धों को शामिल नहीं किया गया। टीम ने गिद्धों की प्रजातिवार संख्या, उनके आवास, घोंसलों में मौजूद शिशुओं, भोजन करते हुए तथा नदी-नालों के पास पानी पीते हुए गिद्धों का भी रिकॉर्ड ऐप में दर्ज किया।


इस अभियान में वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ रतनगढ़ और जावद के रेंजर विपुल, रामपुरा के रेंजर भानुप्रताप सिंह सोलंकी, डिप्टी रेंजर्स तथा बड़ी संख्या में वॉलिंटियर्स ने भाग लिया। सेवानिवृत्त सहायक प्राध्यापक डॉ. साधना सेवक, डॉ. लखन सिंह यादव, डॉ. सुषमा सोलंकी सहित विशेषज्ञों और विद्यार्थियोंकृनिकिता यादव, अनमोल यादव, इंदरजीत सिंह, प्रिंस शर्मा, हर्षल चौहान, अंजली शर्मा, भाग्यश्री पंवार, अक्षय यति, प्रहलाद भील, विकास मेघवाल और अभिषेक भट्टकृने भी सक्रिय सहयोग किया।

वन विभाग ने बताया कि वॉलिंटियर्स की भागीदारी से गिद्ध संरक्षण के प्रति आमजन में जागरूकता, जिज्ञासा और संवेदनशीलता बढ़ी है, जो भविष्य में इस महत्वपूर्ण प्रजाति के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगी।

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