नर्मदापुरम। वन्यप्राणियों की सुरक्षा का दम भरने वाले वन विभाग का एक ऐसा खौफनाक और शर्मनाक चेहरा सामने आया है, जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। मामला नर्मदापुरम जिले के बासनिया गांव का है। जहां 21 जनवरी 2026 को दो बेजुबान काले हिरणों को शिकारियों ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह नहीं है कि शिकार हुआ। चौंकाने वाला खुलासा तो यह है कि विभाग के बड़े अफसरों ने मिलकर 7 महीने तक इस पाप को फाइलों के नीचे दबाए रखा!
क्रूरता की हदें पार, पैर बांधकर घोंटा दम, वनकर्मियों ने रची ‘प्राकृतिक मौत’ की साजिश
बासनिया गांव में जब दो काले हिरण मिले, तो नजारा दिल दहला देने वाला था। बेजुबान हिरणों के पैर बंधे हुए थे और वे तड़प-तड़प कर दम तोड़ चुके थे। प्रत्यक्षदर्शियों और सबूतों से साफ था कि शिकारी इन्हें जिंदा पकड़कर ले जा रहे थे। बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी मुहर लगा दी कि हिरणों की मौत दम घुटने से हुई थी। लेकिन, जब रक्षकों को ही भक्षक बनने का चस्का लग जाए, तो इंसाफ की उम्मीद किससे करें? विभाग के स्थानीय वनकर्मियों ने शिकारियों को बचाने और खुद की गर्दन सुरक्षित रखने के लिए इस जघन्य अपराध को ‘प्राकृतिक मौत’ का रूप देने की कोशिश की। सबूत मिटाए गए, सैंपल्स को नष्ट करने का खेल खेला गया।
दिखावे के लिए सस्पेंशन, 7 महीने तक दोषियों पर मेहरबान रहा विभाग!
मामला जब तूल पकड़ा, तो विभाग ने आनन-फानन में सिवनी मालवा के रेंजर आशीष रावत, वनपाल महेश गौर और चार वनरक्षकों (मनीष गौर, रूपक झा, ब्रजेश पगारे, पवन उइके) को सस्पेंड तो कर दिया, लेकिन यह सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने की कवायद थी! बड़ा सवाल यह था कि आखिर 7 महीने तक इस गंभीर फाइल पर कौन सी ‘मलाई’ लगाई जा रही थी? इतने बड़े आपराधिक मामले के बाद भी दोषियों पर कोई कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या बड़े अधिकारी अपने ही भ्रष्ट अमले को बचाने के लिए सेटिंग में लगे थे?
जब मीडिया ने घेरा, तब टूटी DFO साहब की कुंभकर्णी नींद!
7 महीने तक जब सब कुछ ठंडे बस्ते में रहा, तो मीडिया के तीखे सवालों ने महकमे में हड़कंप मचा दिया। जैसे ही फाइल DFO गौरव शर्मा की टेबल पर पहुंची, साहब की नींद खुली और उन्होंने अपनी ही टीम के पापों को स्वीकार किया। DFO गौरव शर्मा ने मीडिया के सामने कबूला यह बेहद गंभीर और खेदजनक मामला है। इस आपराधिक कृत्य में हमारे रेंज ऑफिसर स्तर के अधिकारी तक की मिलीभगत पाई गई है। विभाग ऐसी अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। सभी दोषियों को चार्जशीट दी जा चुकी है और मामला गंभीर होने के कारण हमने वरिष्ठ अधिकारी को संयुक्त विभागीय जांच की सिफारिश भेजी है।
साहब ने देरी पर दी सफाई में कहा कि कानूनी पचड़ों और कागजी कार्रवाई के चक्कर में मामले में ‘बहुत दिन’ लग गए, लेकिन अब यह मामला उनकी ‘टॉप प्रायोरिटी’ पर है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। अब देखना यह होगा कि DFO साहब का यह बयान सिर्फ एक और ‘कागजी दिलासा’ है या सच में इन बेजुबान हिरणों के हत्यारों और उनके मददगार रेंजर-वनकर्मियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा। वन विभाग के इस ‘डर्टी गेम’ पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी!