जयपुर। मदन राठौड़ का जन्म पाली जिले के रायपुर मे हुआ था। उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन (बीएससी गणित) किया है। मदन राठौड़ वर्ष 1962 ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक बने थे। 1970 के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में भी कार्य किया है। इसके बाद टेक्सटाइल व्यापारी के रूप में कार्य किया था। चार बार भाजपा के जिला अध्यक्ष रहे हैं। वर्ष 2003 और 2013 में पाली की सुमेरपुर विधानसभा से विधायक रहे है। 2008, 2018 और 2023 में टिकट काट दिया गया था। अभी विधानसभा चुनाव में टिकट कटने के कारण निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया था। इसके बाद नरेंद्र मोदी का फोन आता है मदन नाम वापस उठाओ और भाजपा का एक अनुशासित कार्यकर्ता होने के नाते मदन राठौड़ अपना नामांकन वापस उठा लेते है।इसके बाद राजस्थान से राज्यसभा में भेजने के लिए नेतृत्व की खोज करनी थी तब राज्य संगठन द्वारा भेजे गए दसों नामों को हटाकर अनुशासन के फलस्वरूप मदन राठौड़ का नाम राज्यसभा प्रत्याशी के तौर पर सामने आता है। इसके बाद पार्टी को लोकसभा चुनाव में जाना था और राजस्थान में सबसे मुश्किल सीट बाड़मेर जैसलमेर का दायित्व मदन राठौड़ को सौंपा जाता है। इस चुनाव के बाद मदन राठौड़ एक साक्षात्कार में कहते है कि मुझे पार्टी ने बाड़मेर जैसलमेर के लिए थोड़ा लेट आदेश दिया तब तक नामांकन वापस लेने की तारिक निकल चुकी थी। वरना मुझे पूरा भरोसा है कि मैं उसको मना लेता बाड़मेर जैसलमेर के लिए बीजेपी ने जो टास्क दिया था। मदन राठौड़ चुनाव हार कर भी जीत चुके थे।हालिया कुछ घटनाक्रम के बाद मदन राठौड़ की नियुक्ति यह भी समझाती है कि आखिर दिल्ली क्या चाहती है। मदन राठौड़ बेहद ईमानदार और स्पष्ट छवि के व्यक्ति हैं। एक अनुशासित कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि अनुशासित जीवनचर्या की भी पालना करते हैं। पिछले 52/54 सालों से निरंतर योग करते हैं। अभी 21 जून को योग दिवस के दिन जल योग करते हुए का एक वीडियो भी वायरल हुआ था। मदन राठौड़ वह व्यक्ति है जो पार्टी के भीतर के आंतरिक लोकतंत्र को काबिज रखते हुए सभी नेतृत्व में आपसी सामंजस्य स्थापित कर सबको एक साथ लेकर चल सकते है। मदन राठौड़ पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिला सकते है कि व्यक्ति नहीं बल्कि उसकी कर्मठता और योग्यता ही संगठन का आधार है। इस समय मदन राठौड़ के सामने अनेक चुनौतियां फैला कर स्वागत को तैयार खड़ी है। यह नियुक्ति बहुत ही कठिन समय में हुई क्योंकि अभी बीजेपी अनेक अलग खेमों में बटी हुई है। अगले एक साल में पांच उप चुनावों के साथ साथ मंत्रिमंडल में फेर बदल,निकाय और पंचायत चुनाव, नाराज़ और बागी कार्यकर्ताओं में सामंजस्य स्थापित करना राज्य स्तर के संगठन में परिवर्तन करना,मूल कार्यकर्ता को वापिस से जोड़ना,अपने ओबीसी होने का फायदा उठाना,जातीय समीकरण को साध कर रखना, कांग्रेस में भविष्य के उभरते नेतृत्व को रोकना और सरकार को आम आदमी तक पहुंचना जैसी अनेक चुनौतियों की ललकार सुनाई देती है।अब देखने वाली बात यह होगी कि मदन राठौड़ कितनी जल्दी अपनी स्थिति को अनुकूल कर संगठन में रचनात्मक परिवर्तन लाकर कार्यकर्ताओं में जोश जुनून और विश्वास को स्थापित कर पाते है।