नीमच। जिस देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी है और जिसे कृषि प्रधान कहा जाता है, वहां के किसान ही आज सबसे अधिक परेशान हैं। एक तरफ बिचौलिए और कालाबाजारी करने वाले किसानों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं और उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। दूसरी ओर, किसानों को खाद, बीज और कृषि उपकरण जैसी सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में वे सहकारी केंद्रों पर लंबी कतारों में खड़े रहते हैं और कई बार नकली या कम गुणवत्ता वाली सामग्री खरीदने को मजबूर होते हैं।
सरकारी अनदेखी के चलते कृषि उपकरण, खाद और कीटनाशक की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि किसान की आय स्थिर नहीं है। बिजली और पानी के बढ़ते बिल भी उनके लिए एक बड़ा बोझ बन गए हैं। यही कारण है कि कुछ किसान अपनी समस्याओं से जूझते हुए आत्महत्या जैसे भयानक कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं, जबकि कुछ लोग इसे उनका व्यक्तिगत दोष मानते हैं।
सूत्रों के अनुसार, तहसील के गांव खेत पालिया में किसान अमर सिंह पुत्र कारुलाल रावत ने अपने 3 बीघा खेत से मात्र 10 किलो सोयाबीन मिलने के बाद अपनी मेहनत और खून-पसीने से उगाई फसल को जलाकर विरोध जताया। यह घटना किसानों की दुर्दशा और सरकार की नाकामी को उजागर करती है।
किसान प्राकृतिक आपदाओं जैसे पीला मोजक रोग और अतिवृष्टि से पहले ही परेशान हैं, लेकिन सरकार केवल भावांतर योजना जैसे वादों तक सीमित है, जबकि फसल तो उगी ही नहीं। किसानों का कहना है कि ऐसी योजनाओं से उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता और यह केवल अन्नदाताओं के साथ मजाक जैसा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक देश के किसान और अन्नदाता खुशहाल नहीं होंगे, तब तक देश की कृषि और अर्थव्यवस्था की तरक्की अधूरी रहेगी।