नीमच। मध्यप्रदेश का सीमावर्ती जिला नीमच अपनी ऐतिहासिक, सामाजिक और औद्योगिक पहचान के लिए सदैव चर्चाओं में रहा है। नीमच की विशेषताएं इसे प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिलाती हैं।
सीआरपीएफ की जन्मस्थली और मानवता की मिसाल
संयुक्त मंदसौर जिले का हिस्सा रहा नीमच आज सीआरपीएफ की जन्मस्थली, नेत्रदान, रक्तदान और देहदान जैसे मानवीय कार्यों में अग्रणी शहर के रूप में जाना जाता है। यहां की कृषि उपज मंडी प्रदेश की प्रमुख मंडियों में से एक है और औषधीय फसलों की उत्पादन क्षमता के चलते नीमच ने पूरे देश में अपनी विशेष पहचान बनाई है।
हरित क्रांति से विकास की राह पर नीमच
मंदसौर से पृथक जिला बनने के बाद नीमच ने तेजी से विकास की दिशा में कदम बढ़ाए। हरित क्रांति की नींव हमारे क्षेत्र के युगपुरुष खुमान सिंह शिवाजी द्वारा निर्मित ठीकरिया बांध से पड़ी। आज नीमच, मनासा और जावद तीनों तहसीलों में तालाबों और बांधों का निर्माण हुआ है, जिससे सिंचाई और कृषि में बड़ा बदलाव आया है। सांसद सुधीर गुप्ता द्वारा सड़कों का विस्तृत जाल बिछाया गया है, जबकि विधायक दिलीप सिंह परिहार क्षेत्र में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत हैं।
उद्योग क्रांति के साथ नई संभावनाएं, लेकिन चिंता भी
वर्तमान में जिले के तीनों विधानसभा क्षेत्रों में उद्योग क्रांति तेजी से बढ़ रही है। झांझरवाड़ा नए औद्योगिक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है, जहां देशभर की कई बड़ी इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं। रामपुरा क्षेत्र में पावर प्लांट और अन्य उद्योगों का विकास हो रहा है, वहीं जावद क्षेत्र में भी नए उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। हालांकि, इस औद्योगिक विकास के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि कहीं यह तेज़ी से बढ़ता औद्योगीकरण नीमच की शुद्ध आबोहवा और पर्यावरण संतुलन को प्रभावित तो नहीं कर देगा?
प्रदूषण की बढ़ती आशंका और जनमानस की चिंता
पिछले कुछ महीनों से नीमच शहर और आसपास के 10 किलोमीटर क्षेत्र में एक असामान्य दुर्गंध की समस्या से लोग परेशान हैं। कई नई बीमारियों के मामले भी सामने आए हैं। स्थानीय मीडिया और सामाजिक संगठनों ने इसकी पड़ताल की तो कई बार नए उद्योगों से फैलते प्रदूषण के समाचार मिले। जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को कई बार अवगत कराया गया है, लेकिन अब तक स्थिति में ठोस सुधार नहीं हुआ है। जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में कोई परेशानी नहीं होगी, किंतु दुर्गंध और बीमारियों की समस्या बरकरार है।
मोरवन डैम और झांझरवाड़ा इंडस्ट्रियल एरिया में विरोध के स्वर
हाल ही में जावद क्षेत्र के मोरवन डैम के पास स्थापित की जा रही एक बड़ी फैक्ट्री का स्थानीय लोगों ने विरोध किया है। लगभग 2000 लोगों को रोजगार देने वाली इस फैक्ट्री के विरोध का कारण है उस क्षेत्र में बने बांध का संभावित प्रदूषण, जिससे हजारों बीघा भूमि की सिंचाई प्रभावित हो सकती है।
इसी प्रकार झांझरवाड़ा इंडस्ट्रियल एरिया में भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि फैक्ट्री निर्माण के दौरान गौशाला, स्कूल और सरकारी तालाब की जमीन पर अतिक्रमण किया गया है, जबकि इन तालाबों के विकास पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर चुकी है।
विकास आवश्यक है, लेकिन संतुलन भी उतना ही जरूरी
हरित क्रांति और औद्योगिक क्रांति से रोजगार और प्रगति की संभावनाएं तो बढ़ रही हैं, परंतु यह भी जरूरी है कि इनसे हमारी उपजाऊ भूमि, जनस्वास्थ्य और सरकारी संसाधनों पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
यह प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि विकास की रफ्तार जनता की समस्याओं का कारण न बने। विकास तब ही सार्थक होगा, जब वह पर्यावरण और समाज दोनों के हित में संतुलन बनाए रखे।