मनासा। मनासा स्थित द्वारकापुरी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दौरान सुदामा चरित प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए संत श्री चैतन रामजी महाराज ने कहा कि सुदामा जी ने कभी भगवान श्रीकृष्ण से कुछ भी नहीं माँगा। वे केवल प्रभु के परम भक्त ही नहीं, बल्कि उनके सच्चे मित्र भी थे।
संत श्री ने कथा में बताया कि सुदामा जी की पत्नी सुशीला ने ही उन्हें श्रीकृष्ण से मिलने के लिए प्रेरित किया था और तीन मुट्ठी चावल की पोटली बाँधकर दी। उनका भाव था कि हमारे घर में प्रतिदिन एकादशी समान है, इसलिए मित्र के घर खाली हाथ जाना उचित नहीं। स्वयं सुदामा जी कुछ माँगने के इच्छुक नहीं थे, किंतु पत्नी की आज्ञा का पालन करते हुए वे द्वारका जाने को तैयार हुए।
कथा के दौरान संत श्री ने चावल के प्रसंग की गूढ़ व्याख्या करते हुए बताया कि प्रचलित कथाओं से इतर वास्तविक भाव यह है कि सुदामा जानते थे कि वे चावल दुर्वासा ऋषि के शाप से जुड़े हुए हैं। ऐसी मान्यता थी कि जो भी उन्हें खाएगा, वह श्रीहीन हो जाएगा। सुदामा जी नहीं चाहते थे कि उनके मित्र श्रीकृष्ण श्रीहीन हों। इसी कारण उन्होंने विचार किया कि यदि चावल धरती पर फेंके गए तो धरती बंजर हो जाएगी और यदि नदी में डाले गए तो जलचर मर जाएंगे। अंततः उन्होंने वे चावल स्वयं ही खा लिए। इस प्रकार सुदामा स्वयं गरीब नहीं थे, बल्कि उन्होंने श्रीकृष्ण को गरीबी से बचाया।
संत श्री चैतन रामजी महाराज ने मणि चोरी के प्रसंग पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार का स्वभाव है कि वही लोग पहले किसी को ऊँचा उठाते हैं और फिर उसी को गिराने में देर नहीं लगाते। जिन द्वारकावासियों के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका बसाई, उन्हीं लोगों ने उन पर मणि चोरी का लांछन लगाया। इसी प्रकार अयोध्यावासी वन गमन में श्रीराम-सीता के साथ गए, किंतु बाद में सीताजी पर लांछन लगाए और प्रभु श्रीराम के न्याय पर प्रश्नचिह्न खड़े किए। जब मणि चोरी का सत्य सामने आया, तो वही लोग सत्राजित को भला-बुरा कहने लगे। संत श्री ने कहा कि संसार की हवा कब बदल जाए, यह कहा नहीं जा सकता।
सुदामा चरित की कथा के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया तथा श्रीमद् भागवत कथा का विश्राम हुआ।