नीमच। मोहर्रम के पवित्र दिनों में नीमच की फिज़ा अकीदत, ग़म और इंसानियत के जज़्बे से सराबोर हो उठी है। कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 वफ़ादार साथियों की अज़ीम कुर्बानी तथा तीन दिन की प्यास की याद में शहरभर में सबीलें सजाई गई हैं। इन सबीलों पर ठंडा पानी, शर्बत और तबर्रुक वितरित कर शोहदा-ए-कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश किया जा रहा है।
शहर की बोहरा कॉलोनी और सैफी मोहल्लों में सजी आकर्षक सबीलें श्रद्धालुओं और अज़ादारों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। वर्षों पुरानी इस परंपरा के तहत बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचकर इमाम हुसैन की प्यास और कर्बला की कुर्बानी को याद कर रहे हैं तथा पानी, शर्बत और तबर्रुक ग्रहण कर रहे हैं।
सबीलों की सबसे सुंदर तस्वीर उन ख़िदमतगारों की है, जो पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ राहगीरों एवं अज़ादारों की सेवा में जुटे हुए हैं। कोई शर्बत परोस रहा है, कोई पानी पिला रहा है तो कोई तबर्रुक वितरित कर रहा है। उनके चेहरों पर सेवा का भाव और दिलों में इमाम हुसैन की मोहब्बत साफ झलकती है।
मोहर्रम के अवसर पर लगाई जाने वाली ये सबीलें केवल प्यास बुझाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि कर्बला के उस अमर संदेश की याद दिलाती हैं, जो इंसानियत, त्याग, बराबरी, भाईचारे और हक़ की राह में कुर्बानी देने की प्रेरणा देता है।
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मोहर्रम की सबीलें नीमच की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की खूबसूरत मिसाल प्रस्तुत कर रही हैं।