चित्तौड़गढ़। भागवत केवल कथा नहीं बल्कि जीवन जीने की कला, आत्मा के जागरण का शास्त्र और कलियुग के अंधकार में मोक्ष का प्रकाश पुंज है। आज मनुष्य के पास संसाधनों की कमी नहीं है लेकिन शांति, संतोष और आत्मिक आनंद का अभाव है। इसका कारण ईश्वर से दूर होना है। श्रीमद्भागवत मनुष्य को पुनः उसकी आत्मा और परमात्मा से जोड़ने का दिव्य सेतु है। उक्त उद्गार भागवताचार्य वैदिक पंडित राजेन्द्र शास्त्री ने बुधवार को श्रीमद्भागवत महापुराण के परम माहात्म्य का वर्णन करते हुए व्यक्त किये।
शुभ लाभ कॉलोनी में विगत सात दिनों से चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञान गंगा महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव का समापन बुधवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के अभूतपूर्व वातावरण में सम्पन्न हुआ। सप्तम दिवस की कथा में भागवताचार्य वैदिक पंडित राजेंद्र शास्त्री ने बताया कि श्रीमद्भागवत महापुराण केवल धार्मिक आख्यानों का संग्रह नहीं बल्कि मानव जीवन को धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने वाला दिव्य जीवन-दर्शन है। कलयुग में भगवान के नाम का स्मरण, संतों का सत्संग और श्रद्धापूर्वक भागवत कथा का श्रवण ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश कर उसे परम शांति एवं मोक्ष की ओर ले जाता है। यह मनुष्य को मोह से मुक्ति, अहंकार से विनम्रता, अशांति से संतोष और सांसारिक उलझनों से प्रभु-चरणों की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में उद्धव-गोपी संवाद का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग निष्काम प्रेम और अनन्य भक्ति है। गोपियों ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि जहाँ पूर्ण समर्पण होता है वहाँ भगवान स्वयं भक्त के अधीन हो जाते हैं। भगवान को तर्क, ज्ञान और अहंकार से नहीं बल्कि निष्कपट प्रेम, समर्पण और श्रद्धा से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संसार के सभी संबंध नश्वर हैं, किन्तु जीव और परमात्मा का संबंध शाश्वत है। जो व्यक्ति अपने जीवन में भगवान के नाम को आधार बना लेता है, उसके जीवन के संकट स्वतः ही दूर होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य सुविधाओं से सम्पन्न होते हुए भी मानसिक अशांति से घिरा हुआ है क्योंकि उसने भगवान के नाम-स्मरण और सत्संग से दूरी बना ली है। यदि प्रतिदिन कुछ समय प्रभु चिंतन, माता-पिता की सेवा और सत्कर्मों के लिए समर्पित किया जाए तो जीवन स्वतः आनंदमय बन सकता है।
भागवताचार्य ने राजा परीक्षित और परमपूज्य श्री शुकदेव जी महाराज के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है इसलिए मनुष्य को अपने प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाना चाहिए। मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण, लोकमंगल और ईश्वर प्राप्ति भी है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के संदेशों को व्यवहार में उतारने का आह्वान करते हुए कहा कि कथा तभी सफल होती है जब वह हमारे आचरण में उतरकर परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन-मूल्यों को सशक्त बनाए। भागवत हमें सिखाती है कि मानव जीवन दुर्लभ है और इसका उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और लोकमंगल भी है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने का संकल्प भी आवश्यक है। यदि घर-घर में भगवान का स्मरण, माता-पिता का सम्मान, गौ सेवा, सत्संग और संस्कारों का पालन प्रारम्भ हो जाए तो समाज की अनेक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं।
कथा समापन के पश्चात वैदिक आचार्यों के सानिध्य में विधि-विधान पूर्वक श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा महायज्ञ की पूर्णाहुति सम्पन्न हुई। यजमान परिवार सहित उपस्थित श्रद्धालुओं ने यज्ञ कुंड में आहुतियां अर्पित कर राष्ट्र की अखण्डता व उन्नति, विश्व शांति, प्रकृति के संतुलन, गौसंवर्धन, परिवारों की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य तथा समस्त प्राणी मात्र के कल्याण की मंगल कामना की। पूर्णाहुति के समय वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार व शंख ध्वनि से भक्तिमय हो उठा। आयोजन स्थल पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक जागरण का विराट उत्सव बताया। सात दिनों तक प्रवाहित हुई श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा ने श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति, सेवा, संस्कार और सदाचार के बीज रोपित कर उन्हें धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान की।