अयोध्यापुरी। अयोध्यापुरी धर्मशाला में संत श्री मन्महा उग्रानंद जी महाराज की पावन छत्रछाया में चल रही कथा के दौरान संत श्री कृष्णानंद जी ने श्रद्धालुओं को अनासक्ति का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए मोह और आसक्ति से दूर रहकर ईश्वर का स्मरण करना ही भवसागर से पार उतरने का मार्ग है। कथा के दौरान भरत चरित्र, अजामिल प्रसंग और भगवान नरसिंह के प्राकट्य की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया गया।
भरत जी के प्रसंग से समझाया मोह का प्रभाव-
संत श्री कृष्णानंद जी ने भरत जी के जीवन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भरत जी सब कुछ त्यागकर प्रभु के स्मरण, जप और तप में लीन हो गए थे। एकांत का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि एकांत केवल किसी सुनसान स्थान पर रहना नहीं, बल्कि मन के भीतर के ‘मैं’ और अहंकार का अंत होना ही सच्चा एकांत है।
उन्होंने बताया कि साधना के दौरान भरत जी ने एक गर्भवती हिरणी और उसके शावक का प्रसंग देखा। दया के कारण वे शावक को अपने आश्रम ले आए। धीरे-धीरे शावक के प्रति उनका मोह बढ़ता गया और उनका अधिकांश समय उसकी चिंता में बीतने लगा। परिणामस्वरूप उनका जप, तप और भजन प्रभावित हुआ। संत जी ने कहा कि आसक्ति मनुष्य को ईश्वर से दूर ले जा सकती है, इसलिए संसार में रहते हुए भी अनासक्त भाव बनाए रखना जरूरी है।
अजामिल की कथा में नाम स्मरण की महिमा-
कथा के दौरान संत श्री कृष्णानंद जी ने अजामिल की कथा का भी वर्णन किया। उन्होंने ईश्वर के नाम स्मरण की महिमा बताते हुए कहा कि अंतिम समय में अजामिल ने अपने पुत्र ‘नारायण’ को पुकारा। संत जी ने कहा कि भगवान के नाम का स्मरण मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने भक्त प्रह्लाद का उदाहरण देते हुए ईश्वर भक्ति और नाम स्मरण के महत्व को भी समझाया।
नरसिंह भगवान के प्राकट्य पर भाव-विभोर हुए श्रद्धालु-
कथा के तीसरे दिन भगवान नरसिंह के प्राकट्य का प्रसंग विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। खंभे से भगवान नरसिंह के प्रकट होने का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। कथा के समापन पर विधि-विधान से महाआरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।