नीमच। अफीम नीति को लेकर मालवा-मेवाड़ अंचल के किसानों के हितों और उनकी मांगों को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेता डॉ. सम्पत स्वरूप जाजू ने सत्तारूढ़ दल के सांसदों और उनसे जुड़े किसान संगठनों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि अफीम नीति घोषित होने से पहले किसानों को बड़े-बड़े आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन नीति जारी होने के बाद उनकी प्रमुख मांगें अधूरी रह जाती हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को दिल्ली में फोटो खिंचवाने और मीडिया में बयान देने से नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का ठोस समाधान करने से राहत मिलेगी।
दिल्ली में मुलाकात और आश्वासनों पर उठाए सवाल-
डॉ. जाजू ने कहा कि पिछले कई वर्षों से अफीम नीति घोषित होने से पहले सत्तारूढ़ दल के सांसद और उनसे जुड़े संगठन सक्रिय हो जाते हैं। अफीम सलाहकार समिति की बैठकों के नाम पर केंद्रीय वित्त मंत्री, वित्त राज्य मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की जाती है। इसके बाद इन मुलाकातों की तस्वीरें और बयान सोशल मीडिया तथा समाचार माध्यमों में प्रचारित कर किसानों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनकी सभी मांगें पूरी होने वाली हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी हकीकत इससे अलग रहती है। नीति घोषित होने पर किसानों की कई प्रमुख मांगें पूरी नहीं होतीं और उन्हें हर साल निराशा का सामना करना पड़ता है। डॉ. जाजू ने इसे किसानों को भ्रमित करने वाली राजनीतिक कार्यशैली बताते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को आश्वासनों के बजाय परिणाम देने चाहिए।
बालकवि बैरागी का उदाहरण देकर सांसदों को घेरा-
डॉ. जाजू ने 1990 के दशक का उदाहरण देते हुए दिवंगत सांसद बालकवि बैरागी के कार्यकाल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय मंदसौर क्षेत्र में भीषण ओलावृष्टि से अफीम की फसल को भारी नुकसान पहुंचा था। तत्कालीन सांसद बालकवि बैरागी ने केंद्र में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी के समक्ष किसानों का पक्ष मजबूती से रखा था। डॉ. जाजू के अनुसार, उस प्रयास के बाद किसानों को औसत में विशेष छूट मिली और शून्य औसत के आधार पर कटे हुए पट्टों की बहाली का रास्ता खुला था।
उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की असली भूमिका संकट के समय किसानों के साथ खड़े होकर उन्हें राहत दिलाने की होती है, न कि केवल मीडिया में बयान देने और मुलाकातों की तस्वीरें साझा करने की।
बड़े राजनीतिक पदों के बावजूद किसानों की मांगें अधूरी-
कांग्रेस नेता ने क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अफीम उत्पादक क्षेत्र से प्रदेश के उपमुख्यमंत्री आते हैं। मंदसौर जिले से दो सांसद हैं और पड़ोसी चित्तौड़गढ़ क्षेत्र में भी भाजपा के वरिष्ठ नेता सांसद हैं। इसके बावजूद अफीम नीति में किसानों की मांगों को लेकर अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं।
डॉ. जाजू ने वर्ष 2024 से 2026 तक की अफीम नीतियों से पहले दिए गए जनप्रतिनिधियों के बयानों और बाद में जारी नीतियों की तुलना करने की बात कही। उनका आरोप है कि किसानों को हर साल बड़े बदलावों की उम्मीद दिलाई जाती है, लेकिन वास्तविक राहत सीमित रह जाती है।
सांसदों से श्वेत पत्र जारी करने की मांग-
डॉ. जाजू ने क्षेत्र के सांसदों से अफीम उत्पादक किसानों के सामने श्वेत पत्र जारी कर अपने प्रयासों और उनके परिणामों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाए कि सांसदों ने संसद में एनडीपीएस एक्ट में संशोधन की मांग कब-कब उठाई और उसका क्या परिणाम निकला? अफीम के समर्थन मूल्य में वृद्धि को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री से कब चर्चा की गई? वहीं, अफीम की फसल को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दायरे में शामिल कराने के लिए क्या प्रयास किए गए?
डॉ. जाजू ने कहा कि अफीम उत्पादक किसानों को अब आश्वासन नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का ठोस समाधान चाहिए। जनप्रतिनिधियों को किसानों के सामने अपने प्रयासों और उपलब्धियों का स्पष्ट हिसाब रखना चाहिए।