चित्तौड़गढ़। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज् प्रतापनगर सेवा केन्द्र पर राजयोग की विधि सिखने काफी संख्या में भाई बहन पहुंच रहे हैं। सेवा केन्द्र पर 3 मार्च से 5 मार्च तक निःशुल्क राजयोग कॉर्स कराया जा रहा हैं। प्रभारी बीके आशा दीदी ने सभी को राजयोग का अभ्यास कराया।
बीके शिवली दीदी ने राजयोग की विधि पर बताया कि राजयोग आत्मा का परमात्मा शिव से सहज मिलन है। इसके लिए स्वंय को आत्मा समझ सारा ध्यान भृकुटी के मध्य केन्द्रीत करना होता है। आत्मा का निवास इस शरीर मे वहां है जहां पर हम तिलक या बिन्दी लगाते हैं। आत्मा मे ही मन-बुद्वि-संस्कार है। मन सोचने का काम करता है, बुद्धि निर्णय करती है इसके बाद हम जैसे कर्म करते है उसके अनुसार हमारे संस्कारों का निर्माण होता है। आत्मा का रूप अतिसुक्ष्म ज्योति बिन्दु है। वैसे ही उस पिता परमात्मा का रूप भी ज्योति बिन्दु स्वरूप है। शरीर विनाशी है जबकि आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है। आत्मा ही एक शरीर छोड दूसरा शरीर धारण करती है। आत्मा शरीर की ऑखों द्वारा नहीं दिखायी देती है। आत्मा इस शरीर मंे रह कर कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्य करती है। विश्व की सारी आत्माओं के पिता एक परमात्मा शिव है। शरीर के पिता सबके अलग-अलग है। जो हर जन्म में बदलते हैं। लेकिन शरीर में विद्यमान आत्माओं का पिता है। सबका एक है।
परमात्मा शिव अजन्मा, अकर्ता व अभोक्ता है। वे सदैव जन्म-मरण से न्यारे है। आत्माओ की तरह परमात्मा कभी भी मॉ के गर्भ से जन्म नही लेता। वह तो विश्व कल्याण के लिए ब्रह्मा तन में पुनः उत्तरित होते है। कलियुगी रूपी अन्धकार मे सतयुगी रूपी उजाला लाने व सर्व का कल्याण करने के लिए धरा पर अवतरित होते है। प्रकृति मनुष्य, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का कल्याण कालों के काल बाबा महाकाल शिव करते है। वर्तमान में वो धरा पर आकर मनुष्यों को राजयोग सिखा कर पुनः नर से नारायण बनने की विधि बता रहे है। जिसे ही राजयोग कहा गया है। जिससे सारा संसार पुनः स्वर्णिम संसार बन जाता है।