चित्तौड़गढ़। स्थानीय गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री जी ने कहा कि भावों-भावों से उपार्जित कर्मों को काटने का मार्ग तपस्या है। भगवान महावीर ने भी कर्मों के क्षय के लिए तप की शक्ति को महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि इच्छाओं का निरोध ही तप है और मन को मजबूत बनाकर सामर्थ्य के अनुसार तपस्या प्रारंभ करनी चाहिए।
महासती पूर्वीश्री जी ने कहा कि “आत्मा सिद्धों जैसी ही जीव है।” सिद्ध भगवान और हमारी आत्मा का स्वरूप एक जैसा है, अंतर केवल इतना है कि हमारा चित्त प्रायः बाहरी विषयों में लगा रहता है, जबकि सिद्ध भगवान की आत्मा स्व में स्थित रहती है। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति स्वयं पर ध्यान केंद्रित करे तो जीवन की दिशा निश्चित रूप से बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि मन में भीतर से यह तड़प जागनी चाहिए कि मुझे भी भगवान बनना है। सिद्धों के स्वरूप का चिंतन करने से जीवन की दिशा बदलती है। व्यक्ति को अनासक्त भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। मनुष्य जीवन, जिन शासन और सद्गुरु का सानिध्य अत्यंत दुर्लभ है। ऐसे संयोग बार-बार मिलें, यह निश्चित नहीं है। इसलिए जीवन में सफलता के लिए मुक्ति मार्ग की ओर कदम बढ़ाना चाहिए।
तप की भावना को कमजोर नहीं होने दें-
महासती ने कहा कि भगवान महावीर के शासनकाल में गज सुकुमाल मुनि के भीतर भी आत्मकल्याण की तीव्र तड़प जागी थी। जब तपस्या की भावना जागृत हो तो व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार तप प्रारंभ कर देना चाहिए। तप के भावों को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। परिवारजन और सहयोगी भी साधक का सहयोग करें, ताकि तपस्या सफल हो सके।
उन्होंने कहा कि साधना शरीर और मन दोनों से होती है। आत्मा में स्थित रहना ही साधना और तपस्या का मूल भाव है। मन की कमजोरी के कारण व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया करने लगता है। इसलिए मन को मजबूत करने के साथ सुनने की शक्ति और सहनशीलता का भी विकास करना आवश्यक है।
अश्विनी ने 9 और रिक्षिता ने 8 उपवास की तपस्या की
प्रवचन सभा में राकेश नाहर एवं कोमल नाहर की सुपुत्रियों अश्विनी नाहर ने 9 उपवास तथा रिक्षिता नाहर ने 8 उपवास की तपस्या पूर्ण की। दोनों बहनों की तपस्या की अनुमोदना करते हुए महासती पूर्वीश्री जी ने कहा कि छोटी उम्र में इतनी बड़ी तपस्या करना प्रेरणादायी है। अध्ययनरत दोनों बालिकाओं ने पूरे उत्साह और मनोबल के साथ तप में मन लगाया। उन्होंने कहा कि अन्य लोगों को भी दोनों बहनों के तप और मनोबल से प्रेरणा लेनी चाहिए।
परिवार की ओर से भी तपस्या में पूरा सहयोग किया गया। महासती ने भजन “काया कमजोर पर मन बलवान जी, हम भी जगाएं शक्ति करें गुणगान जी” की पंक्तियों के माध्यम से तपस्या के प्रति उत्साह जगाया।
सचित्त वस्तुओं के त्याग का बताया महत्व
प्रवचन के पूर्व महासती सुश्रिया श्री जी ने संबोधित करते हुए भगवान महावीर द्वारा बताए गए सचित्त वस्तुओं के त्याग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान की आज्ञा का पालन करने से श्रावक के व्रतों का पालन भी सहज रूप से होता है। उन्होंने सचित्त एवं अचित्त वस्तुओं के संबंध में आवश्यक सावधानियों की विस्तार से जानकारी दी तथा श्रद्धालुओं से प्रत्याख्यान करवाए।
तप अनुमोदना के अवसर पर मंजू अंबानी, कल्पना पटवारी एवं समता बहू मंडल की पदाधिकारियों ने तपस्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए दोनों बहनों के तप की अनुमोदना में अभिनंदन गीत प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर संघ संरक्षक हस्तीमल पोखरना, शांतिलाल जरौली, हगामीलाल भड़क्त्या, नवल सिंह मोदी एवं जिनेंद्र कुमार मेहता सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पदाधिकारियों ने सभी श्रद्धालुओं से अधिकाधिक धर्मलाभ लेने की विनम्र अपील की।
परिवारजनों के अनुसार स्वर्गीय मोहनलाल एवं रतनबाई नाहर की पौत्री अश्विनी नाहर ने 9 उपवास तथा रिक्षिता नाहर ने 8 उपवास की तपस्या पूर्ण की। दोनों बहनों ने महासती पूर्वीश्री जी से प्रत्याख्यान लेकर तपस्या की।