उज्जैन। बैकुंठ चतुर्दशी पर रविवार को मोक्षदायिनी शिप्रा के सिद्धवट घाट पर आस्था का सैलाब उमड़ा। देशभर से आने वाले श्रद्धालु शिप्रा में डुबकी लगा कर अपने पितरों के निमित्त तर्पण-पिंडदान करने के बाद भगवान सिद्धवट को दूध अर्पित किया। सुबह 6 बजे से ही दूध अर्पित करने वाले श्रद्धालुओं की लाईन लग चुकी थी। मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग में जाम की स्थिति बनी थी।
कार्तिक मास की वैकुंठ चतुर्दशी पर सिद्धवट पर सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर शिप्रा स्नान किया। बड़ी चतुर्दशी होने से घाट पर पितरों के निमित्त कर्मकांड का विशेष महत्व होता है। इसी मान्यता के चलते श्रद्धालुओं ने सिद्धवट घाट पर पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान करने के बाद भगवान सिद्धवट को दूध अर्पित किया।
मंदिर के पुजारी पं. सुधीर चतुर्वेदी ने बताया कि मान्यता है कि चतुर्दशी पर सिद्धवट पर पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान करने तथा सिद्धवट पर दूध चढ़ाने से पितृ प्रसन्न होते हैं तथा स्वजन को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते है। चतुर्दशी पर दान पुण्य करने के साथ भिक्षुकों को भोजन वितरित करने और गायों को चारा खिलाने का महत्व है।
रविवार को प्रातरू 5 बजे भगवान सिद्धवट के पट खोलने के बाद पूजन कर श्रृंगार किया गया। इसके बाद विश्व कल्याण की कामना के साथ सबसे पहले सिद्धवट के सभी पुरोहित व पुजारी परिवार द्वारा अभिषेक कर दूध अर्पित किया गया। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया गया। सुबह ही श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर से बाहर सड़क तक पहुंच गई थी। वहीं मंदिर की ओर आने वाले मार्ग में वाहनों की कतार लगने से जाम की स्थिति बनी रही। बाहर से आने वाले श्रद्धालु स्नान पूजन, तर्पण के बाद भगवान को दूध अर्पित कर गंतव्य की ओर रवाना हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि सिद्धवट पर की गई पूजा से पितरों को बैकुंठ में स्थान मिलता है।