डेस्क। श्री अयोध्या धाम में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन 22 जनवरी 2024 को होने जा रहा हैं। दुनिया भर के राम भक्तों में अपार ख़ुशी और उत्सुकता का माहौल हैं। हर कोई इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए लालायित हैं। आज से 29 साल पहले 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में लाखों कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया था। भाजपा नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में 5 दिसंबर 1992 की सुबह से ही अयोध्या में विवादित ढांचे के पास कारसेवक पहुंचने शुरू हो गए थे। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ढांचे के सामने सिर्फ भजन-कीर्तन करने की इजाजत दी थी, लेकिन अगली सुबह यानी 6 दिसंबर को भीड़ उग्र हो गई और बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया। कहते हैं कि उस समय 1.5 लाख से ज्यादा कारसेवक वहां मौजूद थे। उन्ही में से एक मध्य प्रदेश के सबसे काम उम्र के कारसेवक राकेश सेन थे।
राकेश सेन नीमच जिले की जावद तहसील के डिकेन निवासी हैं। बाबरी ढांचे को गिराने में इनकी भी अहम भूमिका रही। आज जब अयोध्या में भगवान श्री राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही हैं। तो राकेश सेन बेहद खुश और खुद को भाग्यशाली मान रहे हैं। 1990 से 1992 तक कारसेवकों के आंदोलन में क्या कुछ हुआ और कैसे कारसेवक अयोध्या पहुंचे पूरा घटनाक्रम राकेश सेन की जुबानी पढ़ते हैं।
नीमच जिले की जावद विधानसभा क्षेत्र के जावद, सिंगोली, डिकेन से हम करीब 25 स्वयंसेवक अयोध्या के लिए जावद के पूर्व विधायक दुलीचंद जैन के नेतृत्व में जावद के निवास तडबा, सिंगोली के कैलाश वकील, शमा पहलवान सहित ऐसे अनेक वरिष्ठजन कारसेवकों में शामिल थे। सिंगोली शिशु मंदिर पर सभी कारसेवक एकत्रित होकर रात्रि विश्राम कर दुसरे दिन प्रातः सिंगोली नगर से जुलूस के साथ सभी कारसेवकों का स्वागत सम्मान विजय तिलक लगाकर अयोध्या के लिए रवाना किया। कोटा, कानपुर, लखनऊ और फैजाबाद होते हुए हम सभी 05 दिसबर 1992 को अयोध्या पहुंचे।
अयोध्या में 1990 के बजाय 1992 में कहीं ज्यादा तनाव था। तैयारी भी ज्यादा थी।इस बार हम बड़ी संख्या में जा रहें थे। हमारी टोली ट्रेन से फैजाबाद पहुंची। इस बार वहां कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार थी। भारी सुरक्षा व्यवस्था थी। बाबरी ढांचे के चारों ओर बड़ी तादाद में सुरक्षाबल तैनात थे। नजदीक की इमारतों पर सुरक्षाबल दूरबीन लगाकर निगरानी रख रहे थे और लखनऊ और दिल्ली सूचनाएं भेज रहे थे। दूसरी ओर पूरे देश से जमा हुए लाखों स्वयंसेवक, शिवसैनिक, विहिप, बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और अन्य श्रद्धालुओं का उत्साह भी प्रचण्ड था।
06 दिसंबर को सुबह सरयू नदी में स्नान कर हम सभी अनुशासन में अपने नियत स्थान पहुंच गए। वहां मंच पर आडवाणी, उमा भारती, मुरलीमनोहर, साध्वी ऋतम्भरा जी एवं राजमाता विजयाराजे सिंधिया सहित अनेक प्रभावी नेता उपस्थित थे। मंच से लगातार घोषणाएं की जा रही थी कि कोई भी अनुचित कार्य नहीं करना है और अनुशासन बनाए रखना है। इसी दरमियान एक श्रद्धालु विवादास्पद ढांचे के उपर चढ़ गया और उसने वहां भगवा ध्वज फहरा दिया। यह देख कर उपस्थित भीड़ बेकाबू हो गई और कईं लोग ढांचे पर चढ़ गए और उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। मंच से शीर्ष नेतृत्व लगातार संयम बरतने के लिए कह रहा था। अनुशासन बद्ध स्वयंसेवक नियत स्थान पर ही मौजूद रहें।
अगले दिन सुबह जब हम ढांचे के स्थान पर पहुंचे तो ध्वस्त ढांचे का मलबा भी वहां से हट रहा था। हमें शीघ्र ही वहां से निकल जाने के निर्देश दिए गए। ट्रेन उपलब्ध थी और जगह-जगह पर भोजन आदि की व्यवस्था भी उत्कृष्ट थी। अयोध्या से फैजाबाद, लखनऊ, कानपुर होते हुए कोटा से रावतभाटा, सिंगोली पहुंचे। जहां कोटा से पुलिस प्रशासन द्वारा हमें सिंगोली थाने लाया गया। सिंगोली थाने से अपने-अपने गांव सुरक्षित घर पहुंचाया गया। वर्षों पुराना कलंक हटाने की खुशी संपूर्ण भारत वर्ष में थी। कार सेवकों का जगह-जगह स्वागत सम्मान किया गया और गांव में भी बद्रीलाल पाटीदार और मेरा स्वागत किया गया। 06 दिसंबर की कारसेवा के लिए तो मैं खुद को बहुत ही धन्य मानता हूं कि शाहपुरा पीठाधीश्वर 1008 श्री रामदयाल जी महाराज ने भी मेरा सम्मान जावद में किया एवं सेनाचाय 1008 श्री अचलानंद जी महाराज जी सहित ऐसे अनेक बड़े-बड़े नाम है, जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 की सफल कारसेवा में सबसे कम उम्र का कारसेवक बनने की वजह से सम्मान स्वागत किया गया था।
मैं अपने आप को गौरवशाली मानता हूं। 06 दिसम्बर 1992 की कारसेवा की में मध्य प्रदेश के सबसे कम उम्र के सफल कारसेवक के रूप में मेरा नाम दर्ज हुआ। मेरे लिए सौभाग्य की बात हैं। मुझे उस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने का अवसर मिला।
इससे पूर्व 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा में भी हमारे नगर से भी अयोध्या के लिए कारसेवा में कारसेवक गये थे। उसके बाद 1991 की कारसेवा में भी हमारे नगर से तीनों ही बार की कारसेवा में अलग-अलग जत्थों में तीनों ही बार की कार सेवा में डीकेन के कारसेवक शामिल रहे हैं। मैं उन सौभाग्यशाली कारसेवकों में हूं जो 30 अक्टूबर 1990 की कार सेवा में मंदसौर जेल में 8 दिन नगर के 15 कारसेवकों के साथ रहा। तत्पश्चात 1992 की विशाल कार सेवा में भी नगर से मात्र दो कारसेवक गए, जिसमें भी सबसे कम उम्र का सफल कारसेवक के रूप में मेरा नाम दर्ज हुआ। मैं भाग्यशाली हूं कि वर्षों पुराने कलंक को मिटाने में साक्षी रहने का मुझ छोटे से गरीब नाई के बेटे का नाम मध्य प्रदेश के सबसे छोटे सफल कारसेवक के रूप में नाम दर्ज हुआ। आज अपनी आंखों से अयोध्या मे प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर के उद्घाटन और रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। मेरा जीवन धन्य हो गया।
मैं मात्र 14 वर्ष की आयु से ही लगातार धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों में शामिल रहता आया हूं। अभी 50 वर्ष की उम्र है, लेकिन सबसे बड़ा भाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप को राम जी के मंदिर में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा अपनी आंखों से देख रहा हूं। हमारा नगर धार्मिक मंदिरों की नगरी होने से बच्चे बच्चे में धार्मिक भावना कूट-कूट कर भरी रहती है एवं बचपन से ही धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों में शामिल रहता आया हूं। जीवन की कुछ इच्छाए ईश्वरीय आशीर्वाद की वजह से ही यथार्थ में बदलती हैं।
22 जनवरी को रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा समारोह से भावुक हूं, भाविहल हूं। 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा सभी भारतीयों एवं दुनिया भर के राम भक्तों के लिए ऐसा ही पवित्र अवसर है। हर तरफ प्रभु श्री राम की भक्ति का अद्भुत वातावरण हैं। चारों दिशाओं में राम नाम की धुन हैं। हर किसी को इंतजार हैं 22 जनवरी का। उस ऐतिहासिक पवित्र पल का जब अयोध्या में प्रभु श्री राम जी रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी। पहली बार जीवन में इस तरह के एक अलग ही भाव भक्ति का अनुभव कर रहा हूं। उस समय की कारसेवाओं का वर्णन और राम जी के कार्य के लिए अपनी भावनाओं को मैं शब्दों में कह पाना मुश्किल हैं, लेकिन मैंने अपनी तरफ से एक छोटा सा प्रयास किया हैं। आगामी अंकों में अन्य कारसेवको की अभिव्यक्ति का प्रयास करूंगा।