चित्तौड़गढ़। श्री कल्लाजी के कृपा प्राप्त गौनन्दन भागवताचार्य पंडित विकास नागदा ने प्रचलित दोहे का उल्लेख करते हुए कहा कि दु:ख में सुमिरन सब करें, सुख में करें न कोय। यह बात उन्होंने कुंती की स्तुति के संदर्भ का विस्तार करते हुए कहा कि जब भगवान श्री कृष्ण ने भुआ कुंती को वरदान मांगने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि उन्हें वरदान में विपत्ति चाहिए, तो प्रभु ने कहा दु:ख तो बहुत देख लिया, अब सुख की कामना करों, तब कुंती ने स्पष्ट कहा कि सुख आ गया तो आपसे वंचित हो जाऊंगी, क्योंकि जब जब भी मुझ पर विपत्ति आई श्री कृष्ण ने आकर मेरी रक्षा की है। इसलिए मुझे विपत्ति ही विपत्ति चाहिए।
पंडित नागदा गुरूवार को श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान द्वारा निम्बाहेड़ा वेदपीठ परिसर में आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के द्वितीय दिवस वेदपीठ परिसर में व्यासपीठ से कथा अमृतपान करा रहे थे। उन्होंने कौरव पांडव युद्ध का विस्तार करते हुए अश्वत्थामा द्वारा पांच पांडव पुत्रों को मार देने पर दुर्योधन के विलाप का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरू पुत्र होते हुए अश्वत्थामा ने पांडव वंश का नाश कर दिया, जो असहनीय है। उन्होंने उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने एवं उत्तरा द्वारा अपने आराध्य श्री कृष्ण को पुकारने का उल्लेख करते हुए कहा कि श्री कृष्ण ने गर्भ में पल रहे परिक्षित की रक्षा कर उत्तरा को जीवन दान देकर कृतार्थ किया। पंडित नागदा ने भीष्मपितामह को इच्छा मृत्यु के वरदान की चर्चा करते हुए कहा कि जब वे सरशय्या पर मृत्यु का वरण कर रहे थे, तो श्री कृष्ण उनके सम्मुख पहुंच गए, तो पितामह ने श्री कृष्ण से मधुर मुस्कान के साथ सामने रहने का आग्रह किया। जिस पर श्री कृष्ण ने कहा कि मेरे द्वारा कुछ भी करने से आप देह त्याग नहीं कर पाएंगे, तब भीष्मपितामह ने कहा कि मेरी अंतिम ईच्छा प्रभु के आनंद दर्शन की थी, इसके पूरा होते ही वे प्राण त्याग देंगे। पंडित नागदा ने गौसेवा के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि एक बार राजा परिक्षित आखेट के लिए वन में गए तो वहां एक गाय और एक बैल के वार्तालाप को सुनकर चकित हो गए, क्योंकि बैल के चारों पैर कटे हुए थे, फिर भी उसने अपनी दशा का कारण कर्मों का फल बताया, जबकि गाय ने कहा कि वे पृथ्वीस्वरूपा है और उस पर जब-जब भी संकट आता है तो वे गौस्वरूप में प्रभु को पुकारती है। इस प्रसंग से प्रत्येक व्यक्ति को गौसेवा का संकल्प लेना चाहिए, ताकि उनके सारे संकट दूर हो सके। इस दौरान उन्होंने कपिल उपाख्यान का भी विस्तार से वर्णन किया। कथा के दौरान पंडित प्रहलाद कृष्ण एवं साथियों ने मनभावन भजनों के साथ संगत करते हुए वेदपीठ परिसर को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। प्रारंभ में वेदपीठ के पदाधिकारियों ने व्यासपीठ का पूजन किया। वहीं अंत में श्रीमद भागवत महापुराण की आरती की गई। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर नारी मौजूद थे।