चित्तौडगढ़। देवी उपासक आचार्य डॉ. वीरेन्द्र कृष्ण दौर्गादत्ती ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में सत्यवादी राजा हरिशचंद्र से सत्य और धर्म की प्रेरणा लेकर जीवन को सार्थक बनाने की आवश्यकता है। डॉ. दौर्गादत्ती मंगलवार को श्रीमद् देवी भागवत आयोजन समिति की ओर से स्काउट गाइड मुख्यालय में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के षष्टम दिवस पर व्यास पीठ से राजा हरिशचंद्र की मार्मिक कथा का वर्णन कर रहे थे, उन्होंने कहा कि अयोध्या नरेश राजा हरिशचंद्र अपने काल में सत्य के पर्याय थे, वे हमेशा सत्य और धर्म पर अटल रहने वाले थे जिनकी परीक्षा लेने के लिए विश्वामित्र ने उनसे संकल्प करवाकर समूचे राज्य का दान ले लिया, उसके बाद भी दान का यह क्रम बनाए रखा जिसके तहत 200 करोड़ स्वर्ण मुद्राए दान में लेने के लिए राजा हरिशचंद्र को रानी तारामती को ब्राह्मण के घर बेचना पड़ा। इतना ही नहीं स्वयं भी डोम के घर शमशान घाट में सेवा देने को विवश हुए इसके बावजूद पुत्र रोहित का निधन हो जाने पर मृत्यु कर व कफन मांगने पर हरिया यानि राजा हरिशचंद्र को पत्नी और पुत्र की जानकारी मिल गई, इस दौरान स्वयं धर्म ने आकर धर्म की रक्षा की और विकट विडंबना की स्थिति में जब हरिशचंद्र ने जगदम्बा का आह्वान किया तो शताक्षी स्वरूप में आकर देवी ने राजा हरिशचंद्र की रक्षा करते हुए पूरे राज्य के सभी लोगों को मोक्षगामी बना दिया। डॉ. दौर्गादत्ती ने कहा कि इस प्रसंग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि धर्म के मार्ग पर चलते हुए हमेशा सत्य की विजय होती है। उन्होंने मां जगदम्बा के अनेक स्वरूपों का उल्लेख करते हुए शिव पार्वती के विवाह में बताया कि ऋषि मुनियों द्वारा जब-जब भी कठोर तप किया गया तो मां जगदम्बा ने उनके यहां पुत्री स्वरूप में जन्म लेकर विश्व का कल्याण करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। इसी कड़ी में दक्ष प्रजापति की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके घर में सती का अवतार हुआ जिनका विवाह भगवान शिव से किया गया लेकिन भगवान आशुतोष का अपमान करने के लिए दक्ष प्रजापति ने यज्ञ के बहाने उन्हें आमंत्रित नहीं कर स्वयं के विनाश का उपक्रम कर लिया। जिसके फलस्वरूप बिना महादेव की इच्छा के जब सती यज्ञ मंडप में पहुंची तो मंा के अलावा किसी ने भी उन्हें सम्मान नहीं दिया यहंा तक कि अपने आराध्य पति परमेश्वर का स्थान न देखकर क्रोधित होकर सती ने आत्मदाह कर लिया। इस स्थिति मंे शिवगणों ने जब भोलेनाथ को अवगत कराया तो उन्होंने अपनी जटा से दूत प्रकट कर दक्ष की नगरी में भेजा जिसने यज्ञ विध्वंस करते हुए दक्ष का सिर काटकर यज्ञ कुंड में समर्पित कर दिया लेकिन भगवान विष्णु एवं ब्रम्हा के विशेष आग्रह पर संसार को बचाने के लिए शिव ने कृपा करते हुए दक्ष के मस्तक की जगह बकरे का सिर लगाकर यज्ञ को पूर्ण करवाया लेकिन सती के विरह में वे समूचे ब्राम्हण्ड में सती का शव हाथ में लिये भागते रहे तब सुदर्शन चक्र से सती के 52 भाग हुए जो मां दुर्गा के शक्ति पीठ कहलाये। इसी कड़ी में राजा हिमाचल की तपस्या पर प्रसन्न होकर सती ने पार्वती रूप में जन्म लिया जिनका विवाह भोलेनाथ से कराया गया। इस विवाह के प्रसंग का विस्तार करते हुए व्यास पीठ से दौर्गादत्ती ने मां भगवती की अराधना और उनके विभिन्न स्वरूपो का विस्तार करते हुए कहा कि जो भी प्राणी मां अम्बा की शरण में जाता है उनका कल्याण सुनिश्चित है। आज कथा में लोकालोक वर्णन एवं तुलसी उपाख्यान पर आचार्य श्री अपनी ओजस्वी वाणी में कथा श्रवण कराएंगे। षष्टम दिवस की कथा के पश्चात आयोजक मंडल वरिष्ठ नागरिक मंच एवं आगन्तुक अतिथियों द्वारा व्यासपीठ का पूजन कर आचार्य श्री से आशीर्वाद लिया गया।