मनासा। क्रोध प्रीति का नाश करने वाला होता है,अशक्त शरीर में शक्ति जाग्रत कर देता है,आवेश में इंसान अपना आपा खो बैठता है। चातुर्मास हमें संयमित जीवन की राह दिखाने आया है।हमारी वाणी प्रिय एवं मीठी होनी चाहिए।भटकती हुई आत्मा को परमात्मा की वाणी से बांधना हमारा काम है।
उक्त प्रेरक उदगार स्थानीय जैन उपाश्रय में चल रही व्याख्यानमाला में प्रवचन प्रभाविका परम् पूज्य सौम्ययशा श्रीजी मा.सा. ने व्यक्त किये। जिंदगी को यदि सवाँरना है तो श्रध्दापूर्वक परमात्म वाणी श्रवण किये बगैर जीवन का उद्धार असम्भव है। हम परमात्मा वीर के सैनिक है इसलिए उनकी वाणी को जन-जन तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य है। इस वक्त उपाश्रय चतुर्विध संघ है क्योंकि यहाँ साधु-साध्वी एवं श्रावक-श्राविकाएं चारों उपस्थित है। चतुर्विध संघ की महत्ता तीर्थ जैसी है...यहाँ गणधरों का वास है,तीर्थंकरों का वास है। चतुर्विध संघ को परमात्मा जिनेश्वर भी वंदन करते है। इसलिए उपाश्रय के व्याख्यान में सहभागिता कर परमात्मा की वाणी को आत्मसात करना तीर्थ के लाभ से कम नही है।
अंत में परम् पूज्य अर्पिता श्रीजी मा.सा. ने भी उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को अपने विचारों से लाभान्वित किया।