रात के लगभग 9.30 के आसपास फोर जीरो चौराहा जिसे भारतमाता चौराहा भी कहा जाने लगा है, मैं चंदन पान वाले की दुकान के पास खड़ा था एक महिला पुलिस कांस्टेबल जिसकी उम्र बता रही थी कि उसे इस नौकरी में आए दो तीन या चार साल हुए होंगे। एक धार्मिक जुलूस के दौरान अपनी ड्यूटी पर लगी हुई थी। जाहिर है कि वह जुलूस निकलने से एक दो घंटे पहले ही अपनी ड्यूटी पर आ गई होगी और जुलूस के साथ साथ ही कानून व्यवस्था में अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही होगी। जुलूस लगभग 2-3 घण्टे तो पूरे कर चुका होगा। जुलूस अपने पूरे योवन पर था और इस चौराहे पर देखने वालों की भी काफी भीड़ एकत्रित हो रही थी। डीजे का शोर तमाम सरकारी प्रतिबन्धों के बावजूद भी कानून को मुॅह चिड़ा रहा था। 15-20 ढोल धमाधम कूटे जा रहे थे। युवा नाच रहे थे और ट्रॉफिक जाम हो गया था।
इसी दरम्यान वह महिला पुलिस कांस्टेबल मुझसे आकर पूछती है अंकलजी यहॉ कहीं आसपास वाशरूम है क्या। मैने कहा हॉ है तो पर वह 9 बजे बंद हो जाते है। उस वक्त उसके चेहरे पर जो परेशानी का भाव आया, उसने मुझे विचलित कर दिया। मैं सोचने लगा कि ये बेटियॉं जो इस नौकरी मे आई है कितनी विषम परिस्थितियों में ऐसे समय मे गुजरती है। हम लोग जुलूस का मजा लेते है। इनके लिये ना चाय है ना पानी और ना ही कोई नाश्ता। उपर से यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए तो क्या किया जाए। ये लड़कियॉं, अधिकांश क्या 95 प्रतिशत तक बाहर की होती है, इनका परिचित भी यहॉ कोई नहीं होता है, अपनी ड्यूटी छोड़कर भी नहीं जा सकती। जाहिर है कि किसी के मकान पर जाकर ये भी नहीं कह सकती कि क्या मैं आपका वाशरूम इस्तेमाल कर सकती हूॅ। हम भी किसी परिचित को उसके घर का वाशरूम इस्तेमाल करने की नहीं कह सकते और वो बेटियॉ भी किसी अन्जान के वहॉ कैसे जाएगी। थोड़ी देर बाद उसकी हम उम्र एक महिला पुलिस कांस्टेबल टूव्हीलर लेकर आ गई और बोली चलो हो गया।
वह चली तो गई पर पीछे छोड़ गई कई सारे सवाल जो हमें सोचने पर मजबूर करते है कि कानून व्यवस्था मे लगी ये बेटियॉ कितनी विषम परिस्थितियों मे अपनी ड्यूटी का निर्वाहन करती है। क्या हम कभी इस पर भी सोचेंगे ?
किशोर जेवरिया