नीमच। मनुष्य के सामने उसकी कोई इच्छा पूरी नहीं होना, परिस्थितियों विपरीत बनना मनुष्य को दुःखी कर देती है। मनुष्य स्वयं अपने कर्मों से दुःखी होता है। संसार का कोई भी व्यक्ति उन्हें दुःख नहीं देता है। व्यक्ति अपने कर्म पुण्य करेगा तो उसे फल भी पुण्य कर्म का ही मिलेगा। मानव की अपेक्षाएं कम हो तो दुःख भी कम हो जाता है। इसलिए सभी महापुरुष अपनी अपेक्षाएं नहीं रखते हैं। संसार के प्रति अपेक्षा दुरूखों का मूल कारण है।
यह बात साध्वी सोम्यरेखा श्री जी महाराज साहब की सु शिष्या साध्वी सुचिता श्रीजी मसा ने कही। वे जैन श्वेतांबर महावीर जिनालय ट्रस्ट विकास नगर श्री संघ के तत्वाधान में श्री महावीर जिनालय विकास नगर आराधना भवन नीमच में आयोजित धर्म सभा में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि के लोग धन संपत्ति बांग्ला और सोना चांदी के जेवर के पीछे भाग रहे हैं जबकि इनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता है। साथ जाते हैं सिर्फ पुण्य कर्म मनुष्य को पुण्य कर्म पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए संसार के अन्य भौतिक सुख सुविधाओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए तभी आत्मा का कल्याण हो सकता है।संसार के मनुष्य का ध्यान शरीर के लगाव की तरफ है जबकि हमारा ज्ञान आत्मा के कल्याण के लिए होना चाहिए। महावीर की जिनवाणी में पानी में रहने वाले बारिक से बारिक जीव के प्रति जीव दया की भावना रखी गई है इसीलिए हमें शैंपू और साबुन का उपयोग नहीं करना चाहिए इसमें जीव हिंसा का पाप लगता है प्राचीन काल में लोग काली मिट्टी से स्नान करते थे और स्वस्थ रहते थे आज आज रोग प्रतिरोधक साबुन से नहाने के बाद भी लोग बीमार हो रहे हैं। हम जीव हिंसा करते हैं फिर हमें सुखी कैसे रह सकते हैं। जैन समाज में जन्म लेना गौरव की बात है कुमारपाल महाराज 18 देश के राजा थे। उनकी गौशाला में 11 लाख घोड़े,व हाथी तथा 80हजार गायें थी। उनका पुण्य सदैव प्रबल रहता था।इस वर्षावास में सागर समुदाय वर्तिनी सरल स्वभावी दीर्घ संयमी प.पू. शील रेखा श्री जी म.सा. की सुशिष्या प.पू.सौम्य रेखा श्री जी म सा, प.पू. सूचिता श्री जी म सा, प.पू.सत्वरेखा श्री जी म साआदि ठाणा 3 का चातुर्मासिक तपस्या उपवास जप व विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के प्रारंभ हो गया है।
श्री संघ अध्यक्ष राकेश आंचलिया जैन, सचिव राजेंद्र बंबोरिया ने बताया कि प्रतिदिन 9.15 बजे चातुर्मास में विभिन्न धार्मिक विषयों पर विशेष अमृत प्रवचन श्रृंखला का आयोजन होगा। समस्त समाज जनअधिक से अधिक संख्या में पधार कर धर्म लाभ लेवें एवं जिन शासन की शोभा बढ़ावे।