मनासा। स्थानीय अनुपपुरा गली स्थित जैन उपाश्रय के खचाखच भरे हाल में अपने रविवारीय विशेष व्याख्यान में माँ की ममता विषय पर परम् पूज्य सौम्ययशा श्रीजी मा.सा. ने माँ की महत्ता को रेखांकित करते हुए बताया है कि माँ रत्नों को जन्म देती है वो रत्नगर्भा है। बच्चों को संस्कार देना माँ का परम् कर्तव्य है।पर अफ़सोस आजकल की माताएँ बच्चों को मासूम अवस्था मे ही अपनी जवाबदारी भूल प्ले स्कूल में भेज रही है। ऐसे बच्चे धर्म के संस्कार कैसे सीखेंगें। पहले बच्चे दादा-दादी के साथ रहकर बहुत कुछ सीख जाते थे परंतु आज बच्चे दादा-दादी के वात्सल्य से महरूम है...मेरा आज की माताओं से ये प्रश्न है कि वो बच्चों को क्या संस्कार दे रही है...?? माँ का दायित्व है कि पहले बच्चों को घर के संस्कार दें फिर स्कूली ज्ञान।दुर्भाग्यपूर्ण विषय है कि बच्चों को आज माँ का दूध नही भेड़-बकरियों का दूध पिलाया जा रहा है यही कारण है कि आज के बच्चे छोटी छोटी बातों पर भीट्टी मारते है। आज का बच्चा बॉटल का दूध पीता-पिता बड़ा होकर बॉटल पीने लग गया है। हमारे ज्ञानी महापुरुष अज्ञानी नही थे उन्होंने केवल ज्ञान से देखकर सब बताया है,हमारा मार्ग प्रशस्त किया है। हमारे धर्म की रक्षा में महापुरुषों ने जान की बाज़ी लगा दी और हम क्या कर रहे है यह चिंतन का विषय है। सच्ची माँ दानवीर और शूरवीर को जन्म देती है आप जिनसाशन के पुत्र हो...माँ की महिमा अपरंपार है।
माँ के उपकारों पर प्रकाश डालते हुए पूज्य अर्पिता श्रीजी मा.सा. ने कहा माँ शब्द में सारा संसार समाया हुआ है।माँ वात्सल्य की प्रतिमूर्ती है।माँ के अंतर में क्षमा और वात्सल्य का वास है। माता कभी कुमाता नही होती है इसलिए अपने शब्दों से कभी भी अपने माता-पिता को आहत मत करना।माँ का आशीर्वाद जिस बेटे पर है वो बहुत भग्यशाली है। माँ पर सुंदर गीत की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध किया पूज्य समर्पिता श्रीजी एवं पन्थसिध्दि श्रीजी मा.सा. ने।
प्रवचन के पश्चात वीर मणिभद्र की थाल का विधान बहुत ही आस्था एवं श्रद्धा के साथ धूम धाम से साध्वीभगवंतों के सानिध्य में सम्पन्न हुआ। सम्पूर्ण आयोजन में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे। उक्त जानकारी चातुर्मास समिति के मीडिया प्रभारी गणेश जैन ने दी है।