नीमच। बड़े बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए। प्रतिदिन माता-पिता के चरण स्पर्श करना चाहिए। अच्छे गुणों के संस्कार व्यक्ति को महानता की ओर अग्रसर करते हैं और महान व्यक्ति ही विनम्र और निर्मल मन वाला बनता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति ही भगवान बन सकता है। नैतिक संस्कारों के गुणों के बिना सुंदरता व्यर्थ होती है। व्यक्ति की पहचान उसके संस्कारों और उसके अच्छे गुणों से होती है सुंदरता से नहीं।यह बात सुप्रभ सागर जी महाराज साहब ने कही।
वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे ।उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही नैतिक धार्मिक संस्कारों का ज्ञान सीखाना चाहिए तभी उनका जीवन संस्कार वान बन सकता है। आधुनिक युग में लोग उल्टा कर रहे हैं भौतिक संस्कारों के प्रति तो सावधान है और नैतिक संस्कारों के प्रति लापरवाह है हमें चिंतन करना होगा कि नैतिक संस्कारों के बिना हमारा जीवन सफल नहीं हो सकता है। तीर्थंकरो की तपस्या बहुत कठोर व शक्तिशाली होती है। हीरे का पत्थर सबसे कठोर होता है उस हीरे को भी तीर्थंकर अपने हाथ से बारीक टुकड़े कर सकते हैं। वे अपने शक्तिशाली बल का उपयोग सदैव प्राणियों की रक्षा और कल्याण के लिए ही उपयोग करते हैं। अमृतवाणी की बरसात होती है। बालक बचपन से ही अवधि ज्ञानी होते हैं। तपस्या के लिए यदि हमारा मन कच्चा है तो सब कुछ बिगड़ जाता है और यदि हमारा मन पक्का है तो कठिन से कठिन तपस्या भी सरलता के साथ पूरी हो सकती है। हमें धर्म और नीति के बिना सफलता नहीं मिलती है।
मुनि वैराग्य सागर जी मसा ने कहा कि इसमें संस्कारों का गुण होता है वह वास्तव में सुंदर होता है। फिल्म अभिनेताओं द्वारा लड़ाई झगड़ा हिंसा का प्रदर्शन किया जा रहा है ।इसे पाप कर्म बढ़ता है इसलिए इसे सदैव बचना चाहिए। सेवा का कर्तव्य ही धर्म होता है। यदि हम माता-पिता का आदर नहीं करते हैं तो हमारे जीवन में उन्नति कभी नहीं हो सकती है। एक दूसरे के प्रति सम्मान कम हो रहा है चिंतन का विषय है। व्यक्ति सुनता है और सहन करता है और झुकता है वही महान बनता है। महात्मा गांधी को विदेश में अंग्रेज पुलिस द्वारा लकड़ी के डंडे से पिटाई की गई लेकिन उन्होंने अपने चेहरे से मुस्कान को नहीं छोड़ा था। इसलिए विपरीत परिस्थिति में भी सदैव मुस्कराकर संघर्षों का सामना करना चाहिए तो जीवन में कठिनाइयां भी सरलता से दूर हो जाती है। क्रांतिकारियों ने अपने चेहरे की मुस्कान को कभी नहीं छोड़ा चाहे कितना ही अत्याचार क्यों नहीं बढ़ता गया। क्रोध आने पर मन को शांत रखे तो जीवन में विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता मिल सकती है।परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर जैन समाज एवं चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विजय विनायका जैन ब्रोकर्स, मिडिया प्रभारी अमन विनायका ने दी।