नीमच। पुद्गल के मोह में फंसे हम भावांतर के चक्र को गतिमान किए हुए हैं। पुदग्ल को छोड़े बिना संसार का त्याग संभव नहीं और इसके बिना मोक्ष की अवधारणा भी नहीं है शरीर का राग और संसार का प्रेम हमें बार-बार जन्म मरण के चक्कर में गतिमान कर रहा है।
यह बात साध्वी सोम्यरेखा श्रीजी महाराज साहब की सुशिष्या साध्वी सुचिता श्रीजी मसा ने कही। वे जैन श्वेतांबर महावीर जिनालय ट्रस्ट विकास नगर श्री संघ के तत्वाधान में श्री महावीर जिनालय आराधना भवन नीमच में आयोजित धर्म सभा में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि सब कुछ समझ आता है लेकिन बैराग्य कितनी देर का हमारा वैराग्य है मसानिया वेराग्य जैसा क्षण भर सोचते हैं फिर वापस सांसारिक वृतियों में उलझ जाते हैं। यह पुतग्ल का प्रेम हमें कहां ले जा रहा है विचार करने योग्य है इसका उदाहरण देते आप श्री ने कहा कि परमात्मा ने संसार का त्याग क्यों किया जब परमात्मा को पूर्व भव में सम्यकत्व की प्राप्ति हुई तब उन्होंने विचार किया कि पुतग्ल का प्रेम भवसागर के पार नहीं ले जा सकता इसे छोड़कर ही मोक्ष मार्ग पर आरुढ हुआ जा सकता है। इस पुदग्ल के राग को खत्म करने के लिए संसार का त्याग किया आपने उदाहरण दिया कि जिस तरह वर्षा काल में मेंढक की उत्पत्ति होती है और इस वर्षा काल में ही मर जाते हैं। मानव की प्रवृत्ति भी ऐसी वर्षा वास आए धर्म ध्यान में लीन हुए और वर्षावास की समाप्ति के साथ ही पूर्णाहुति हो गई इसके पीछे हमारा मन व हमारा पुतग्ल के प्रति लगाव ही हमें स्थिर होने नहीं दे रहा है। एकाग्र होने नहीं दे रहा है।
उन्होंने पुरुषार्थ कर पुद्गल के त्याग की बात कहते हैं हुए फरमाया कि छोड़ने की प्रवृत्ति पैदा करो अकाम निझरा की बजाय सकाम निर्झरा करो। इसे हेतु मनुष्य व पशु का उदाहरण देते हुए बताया कि इंद्रिय व मन मनुष्य व पशुओं के पास है। कड़ाके की ठंड हो आप चाय पी रहे हो और बाहर गाय आ जाए तो क्या विचार आता है इसे गर्म चाय पिलाई जाए जबकि मन में पशु के भी विचार हो सकता है कि मुझे चाय पीनी है लेकिन है नहीं पाया तो यह अकाम निर्जरा हुई और आपने पुरुषार्थ किया और तप की सीढ़ियां चढ़ गए ये सकाम निर्जरा हुई। सकाम निर्जरा का महत्व अकाम निर्जरा का नहीं ।पुदग्ल के त्याग से मोक्ष की महिमा सुनाते आदिनाथ भगवान व मरु देवी माता का वृत्तांत सुनाया ।इस वृतांत के माध्यम से उन्होंने ममत्व की प्रकाष्ठा को भी प्रतिपादित किया उन्होंने बताया कि ऋषभदेव संसार त्यागने के बाद कठोर साधना में लीन हुए तब एक मां का ममत्व इतना की पल प्रतिपल सिर्फ एक ही ज्ञान की मेरा ऋषभ कैसा है, उनके पोत्र भरत जो की चक्रवर्ती थे 6 खण्डों के अधिपति थे उन्हें उल्हाने देती कि तुम मजे में हो मेरा ऋषभ कैसा होगा। समय बिता ऋषभदेव पधारे भरत महाराज दादी को लेकर समो सरण में जाते हैं मरु देवी की लालसा बढ़ रही है लेकिन ऋषभदेव जो तीन लोक के स्वामी का ध्यान उनकी ओर है ही नहीं जिसके लिए इतना विलाप असीम स्नेह और वो देख नहीं रहा और यही क्षण इस पुद्गल से ध्यान हटाकर शुक्ल ध्यान ध्याते है केवल ज्ञान की प्राप्ति हो गई है मेहताब पुद्गल के त्याग की उन्होंने जय विराय सूत्र के बारे में बताया कि इस सूत्र में 13 प्रार्थनाएं हैं भययं भव निखेवो..,भवन से कंटाल गया हूं।इस तरह से आगे भी पुदग्ल के त्याग की दर्शाया है को दर्शाया है इसके पूर्व साध्वी वर्या ने फरमाया कि परमात्मा अंनंत गुण की खान फिर भी उसके तीन विशेष गुण जिसमें परहित, सक्त परोपकार पर परार्थ भावना समर्पित है।
इस वर्षावास में सागर समुदाय वर्तिनी सरल स्वभावी दीर्घ संयमी प.पू. शील रेखा श्री जी म.सा. की सुशिष्या प.पू.सौम्य रेखा श्री जी म सा, प.पू. सूचिता श्री जी म सा, प.पू.सत्वरेखा श्री जी म साआदि ठाणा 3 का चातुर्मासिक तपस्या उपवास जप व विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ प्रारंभ हो गया है।श्री संघ अध्यक्ष राकेश आंचलिया जैन, सचिव राजेंद्र बंबोरिया ने बताया कि प्रतिदिन 9रू15 बजे चातुर्मास में विभिन्न धार्मिक विषयों पर विशेष अमृत प्रवचन श्रृंखला का आयोजन होगा । समस्त समाज जनअधिक से अधिक संख्या में पधार कर धर्म लाभ लेवें एवं जिन शासन की शोभा बढ़ावे।