नीमच। शुद्ध आहार से विवेक उत्पन्न होता है। इससे आत्मा जल्दी से परमात्मा बनती है। रात्रि भोजन से जीवों की विराधना होती है और इसी कारण ही आत्मा की दुर्गति होती है। शुद्ध आहार बिना सद्गति नहीं होती है। यह बात आचार्य जिन सुंदर सुरी श्रीजी महाराज के शिष्य रत्न पू.पन्यास तत्वरुचि मसा ने कहीं। वे जैन श्वेतांबर श्री भीड़ भंजन पार्श्वनाथ मंदिर श्री संघ ट्रस्ट के तत्वावधान में मिडिल स्कूल मैदान स्थित जैन भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि भोजन के कारण ही पाप कर्म बढ़ाते हैं। क्योंकि भोजन के लिए ही हम झूठ बोलकर व्यापार करते हैं। आहार (भोजन )से संसार में पांच तत्वों का निर्माण होता है। शरीर की शक्ति के लिए भोजन करना चाहिए स्वाद के लिए नहीं। आशक्ति के त्याग बिना आत्म कल्याण नहीं होता है। भूख लगे तभी भोजन ग्रहण करना चाहिए। सभी रोगी है। उपचार के लिए सभी के पारिवारिक फैमिली डॉक्टर है लेकिन आत्मा के रोग को ठीक करने के लिए फैमिली संत नहीं है चिंतन का विषय है।
शरीर-
जीव माता के गर्भ में आते ही भोजन करता है और भोजन ग्रहण करते ही शरीर का निर्माण कार्य प्रारंभ होता है ।वह माता की कुक्षी में 9 महीने पूरा शरीर तैयार कर लेता है।
परिवार-
जीव तो नित्य अरुपी होता है लेकिन जैसे ही आहार ग्रहण करता है कि शरीर का निर्माण होता है और शरीर के साथ माता-पिता भाई-बहन रूप संबंध तैयार होता है ।आत्मा तो अमर है उसका कोई संबंधी होता ही नहीं है।
रोग-
प्रतिकूल भोजन से शरीर में रोग पैदा होते हैं इसलिए रोगों का मूल भोजन ही है।
पाप-
सिर्फ दो वक्त के भोजन के लिए कितना पाप करना पड़ता है। व्यापार नीति में झूठ बोलना भी भोजन के लिए ही करना पड़ता है।
दुर्गति -
भोजन के कारण ही पाप करना पड़ता है और पाप से दुर्गति निश्चित होती है। शास्त्रों में भी मांस, मदिरा, रात्रि भोजन, कंदमूल का भोजन करने से नर्क जैसी ख़राब गति जाना है। ऐसा लिखा है। इससे यह तय होता है की आहार में विवेक लाया जाए। जिससे आत्मा जल्दी से परमात्मा बन सके।
पूज्य आचार्य भगवंत श्री जिनसुंदर सुरिजी मसा, धर्म बोधी सुरी श्री जी महाराज आदि ठाणा 8 का सान्निध्य मिला। प्रवचन एवं धर्मसभा हुई। प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे प्रवचन करने के व साध्वी वृंद के दर्शन वंदन का लाभ नीमच नगर वासियों को मिला प्रवचन का धर्म लाभ लिया।