नीमच। जीवन में चार दुःख लगे हुए हैं। प्रथम जन्म का दुःख, दूसरा वृद्धावस्था का दुःख, तीसरा बीमारी का दुख, चौथा मृत्यु का दुःख इस तरह संसार में दुरूखों से बचने के लिए आराधना और तपस्या की साधना करनी चाहिए। यह बात सुप्रभ सागर जी महाराज साहब ने कही।वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि तपस्या से मन पवित्र होता है। पवित्र मन दुखों को कम करने में सहायक होता है।
मुनि वैराग्य सागर जी मसा ने कहा कि संसार में कोई भी मनुष्य पाप कर्म पुण्य कर्म के बंधनों से मुक्त नहीं है ।जीवन में यदि हम पाप कर्म करेंगे तो उसका परिणाम हमें दुःख के रूप में भुगतना ही पड़ेगा। लेकिन यदि हम पुण्य कर्म करेंगे तो उसका परिणाम शुभ आनंद होगा इसलिए जीवन में पुण्य कर्म करो पाप कर्म नहीं, संसार में कोई भी मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त नहीं है। यदि हम पाप कर्म करेंगे तो उसका फल भोगना ही है। उन्होंने कहा कि जाने अनजाने में हमसे पाप कर्म होना स्वाभाविक है यदि पाप कर्म हो तो उसका पश्चाताप भी करना चाहिए। ईर्ष्या पाप कर्म को जन्म देती है यदि हमें पाप कर्म से बचाना है तो सर्वप्रथम इर्शया भाव को अपने मन में नहीं आने दे। जीवन में समभाव रखें। यही आत्म सुख का प्रमुख आधार है। इस अवसर पर प्रख्यात कवियत्री अनामिका अंबर ने महावीर स्वामी पर आधारित अपनी मधुर काव्य रचना प्रस्तुत की। धर्म सभा का संचालन जितेंद्र जैन बंटी ने किया।
परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर जैन समाज एवं चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विजय विनायका जैन ब्रोकर्स, मिडिया प्रभारी अमन विनायका ने दी।
कवयित्री अनामिका अंबर ने लिया वैराग्य सागर जी महाराज से आशीर्वाद-
अंतर्राष्ट्रीय प्रख्यात कवित्री अनामिका अंबर ने नीमच प्रवास के दौरान दिगंबर जैन मंदिर पहुंचकर वैराग्य सागर जी महाराज को श्री फल प्रदान कर गुरु वंदना व चरण वंदना कर आशीर्वाद ग्रहण किया। इस अवसर पर मुनि श्री ने मांगलिक श्रवण करवाई । इस अवसर पर कवियत्री अनामिका अंबर का दिगंबर जैन समाज नीमच के पदाधिकारीयों द्वारा पगड़ी पहनाकर सम्मान किया गया।