चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में जिज्ञासुओं के समक्ष प्रवचन करते हुए शांतक्रांति संघ की विदुषी महासती शीलप्रभा ने बताया कि परमपिता अरिहंत प्रभु जैसा बनने के लिए हम एकाग्रता एवं शांत मनोयोग रख कर तन्मयता के साथ प्रभु की प्रार्थना करते हैं। ये प्रार्थना हमें तन से स्वस्थ, मन से प्रसन्न और भावों से निर्मल बना कर केवली आत्माओं की समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा को अपने अन्दर समाहित करने की कोशिश करती है जिस कारण हम परम् आनंद का अनुभव करते हैं। यदि लोहे की कील को समुद्र में फेंका जाए तो वो डूब जाती है परन्तु वो ही कील लकड़ी की नाव का सहारा पाकर समुद्र से पार हो जाती है, उसी तरह यदि जिनवाणी की संगत और जिनेश्वर भगवंतों का सहारा हमें मिल जाय तो हम भी इस संसार सागर से पार उतर सकते हैं। इससे पूर्व महासती सत्यप्रभा ने कहा कि हम धीरे धीरे ही सही सम्यक ज्ञान प्राप्ति की दिशा में कदम बढ़ाएं जिससे अज्ञान के अंधकार को दूर करने में एक दिन सफ़ल हो सकेंगे। संचालन संघ मंत्री इंद्रेश कोठारी ने किया।