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August 12, 2024, 11:39 am
KHABAR : दिगम्बर जैन समाज में चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला प्रवाहित, सुप्रभ सागर जी महाराज ने कहा- संस्कारों के बिना सद्गति नहीं होती है, 30 बच्चों ने जैनत्व उपनयन संस्कार ग्रहण किया, पढ़े खबर 

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नीमच। संस्कारों के बाद में जीवन में आने वाली कठिनाइयां का अनुभव सरलता में बदल जाता है।  संस्कारों की अपना अपनी अलग पहचान होती है। संस्कारों के कारण समाज संस्कारी व्यक्ति का आदर करता है। संस्कार के कारण व्यक्ति का सभी सम्मान करते हैं। संस्कार के लिए विदेशी लोग भी भारत आते हैं। उत्तर भारत में संस्कार धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं चिंतन का विषय है लेकिन दक्षिण भारत में संस्कारों का महत्व आज भी उतना ही है जितना प्राचीन काल में था।संस्कारों के बिना सद्गति की प्राप्ति नहीं होती है।यह बात सुप्रभ सागर जी महाराज साहब ने कही।वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मांगलिक भवन सभागार में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे ।उन्होंने कहा कि संस्कारी को मंदिर में अभिषेक और यज्ञ में बैठने का अधिकार होता है। गर्भधारण संस्कार से  महान संतान जन्म लेती है। वे भक्ति में लीन रहकर सद्गति को प्राप्त कर सकती है और संस्कार सदैव दुष्प्रभाव से बचाते है और सदैव पुण्य कर्म की ओर आगे और निरंतर बढ़ाते है।
मुनि वैराग्य सागर जी मसा ने कहा कि संस्कारी व्यक्ति यदि उच्च अधिकारी बनता है तो उसको अधिक सम्मान मिलता है। संस्कारी व्यक्ति समाज परिवार और राष्ट्र के प्रति अधिक जागरूक रहता है। संस्कृत व्यक्ति माता-पिता की आज्ञा का सदैव आदर करता है। श्री राम ने अपने माता-पिता की आज्ञा के लिए वनवास को स्वीकार किया। यह हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण है। हमें भी अपने माता-पिता की आज्ञा मानना चाहिए तभी हम जीवन में सफल हो सकते हैं। संस्कारी व्यक्ति धर्म की रक्षा के लिए सदैव जागरूक रहता है।

बच्चों को त्याग के संकल्प के साथ दिया उपनयन संस्कार-
इस अवसर पर  दिगंबर जैन मांगलिक भवन सभागार में दिगंबर जैन समाज के 30 बच्चों को मुनि श्री द्वारा कैश लोचन के बाद सर पर स्वास्तिक बनाकर उपनयन संस्कार प्रदान किया गया। संस्कार में 7 वर्ष से लेकर 30 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों ने भाग लिया। बच्चों को जीवन पर्यंत निम्न नियमों का पालन करने का संकल्प भी दिलाया जिसमें उपनयन संस्कार में लेने वाले त्याग.. बड़ ,पीपल, पाकर(अंजीर) ,उमर ,कठुंबर,मद्य (शराब) ,मधु (शहद) ,मांस,सप्त व्यसन का त्याग(शिकार खेलना, जुआ, वैश्या गमन, परस्त्री गमन, मांस मधु, झुठ बोलना) आदि के त्याग करने का जीवन पर्यंत पालन करने का संकल्प दिलाया।
परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के  पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर जैन समाज एवं चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विजय विनायका  जैन ब्रोकर्स, मिडिया प्रभारी अमन विनायका  ने दी।

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