मनासा। जैन धर्म मे तप का सदा बड़ा महत्व रहा है। छोटे बड़े हर उम्र के श्रावक आत्म निर्जरा के लक्ष्य के साथ स्वेच्छा से तपस्या करता है। तपस्या करने के लिए संकल्प बल,मनोबल,धृतिबल, आत्मबल की अपेक्षा होती है। तप ज्योति है,तप साधना है,तप मोक्ष का मंदिर है। उक्त उदगार जैन उपाश्रय मनासा में विराजित साध्वी परम् पूज्य सौम्य यशा श्रीजी म.सा. ने सन्तिकरम् तप के तेरह तपस्वियों के पारने के अवसर पर अनुमोदनार्थ व्यक्त किये।
तप प्रेरक एवं चातुर्मास प्रबंधिका पूज्य अर्पिता श्रीजी मसा ने बताया कि जैन धर्म में बारह प्रकार के तपाचरण का उल्लेख है,जिनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यान्तर तप है। पूज्य समर्पिता श्रीजी म.सा. ने सती अंजना एवं पवनजय के चरित्र पर प्रकाश डाला।