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March 11, 2025, 6:21 pm
NEWS : संभलने की राहें कम, भटकने की राहें ज्यादा, संभलकर जीएं, हेमन्त मुनि ने किया स्थानीय शास्त्री नगर स्थित समता भवन में विशाल धर्मसभा को संबोधित, पढ़े रेखा खाबिया की खबर 

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चित्तौड़गढ़। स्थानीय शास्त्री नगर स्थित समता भवन में विशाल धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए शासन दीपक हेमन्त मुनि म.सा. ने कहा कि आत्मा में अनन्त शक्ति है, अनन्त ज्ञान दर्शन है। सम्यक पुरूषार्थ की आवश्यकता है। जैसे दूध में घी है, लेकिन वह बालक जिसने केवल दूध पीना जाना उसे मालूम नहीं कि दूध में घी है। दूध में से घी कैसे मिलेगा, प्रक्रिया की जानकारी उस बालक को नहीं है और मानता है कि दूध में घी है ही नहीं। ठीक उसी तरह आत्मा की शक्ति के बारे में पता नहीं हो तो अनंत बार जन्म मरण किया, अब कितनी बार और जन्म मरण करना है। अनेक भव बीत गए, अब कितने भव और करना है। चिन्तन जैसा होगा पुरूषार्थ भी वैसा ही होगा। भव सीमित हो जाए। महान आत्माएं एक भव से कल्याण चाहती है। ऐसा सोचने वालों का जीवन बदल जाता है। मुक्ति प्राप्त करना ही है। मानो या न मानो, स्वीकार करो ना या करो। समय तुम्हें टाल देगा, शिथिल कर देगा। जो जीर्ण शीर्ण होता वह शरीर है। आत्मा शाश्वत है। सोचने से नहीं होगा। ज्ञान प्राप्त करके जानना फिर मानना और फिर पुरूषार्थ करना। राग द्वेष नहीं करना। दुनिया में अभाव महसूस नहीं करे, समभाव में रहें। ममत्व भाव व समत्व भाव को समझें। अपेक्षा की उपेक्षा करें। प्राणी मात्र के प्रति दया अनुकम्पा भाव रखें। ‘बन गए कई राजा साधु संसार का वैभव ठुकराकर, निर्वेद का पाठ पढ़ाया भगवान तुम्हारी वाणी ने’ भजन की कड़ियों के माध्यम से प्रेरित किया।
संत नहीं बन सकते कोई बात नहीं पर ऐसा तो हो सकता है कि हम ऐसे बने कि पास बैठने वाले शान्ति का अनुभव करें, आनन्द का अनुभव करें। भीतर में प्रेम वात्सल्य करूणा अनुकम्पा दया नैतिकता ईमानदारी जैसे सद्गुणों वाले जीवन की सफलता होती है। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान से हटकर धर्म ध्यान से जीएं। ध्यान रखना - संभलने की राहें कम है, भटकने की राहें ज्यादा है। मंजिल प्राप्त करने के लिए असंख्या भावनाएं हमारे भीतर रही हुई है उन्हें उभारें तो जीवन धन्य बनेगा।
प्रवचन सभा को पूर्व में शासन दीपिका महासती प्रेमलता म.सा. ने संबोधित करते हुए कहा कि यह विचार जरूरी है कि पुण्य योग से प्राप्त प्राप्तियों का सदुपयोग कितना किया। मानव जीवन मिला स्वयं को जानने के लिए। स्वयं की जानकारी नहीं है और जगत की जानकारी कर रहे हैं। अनावश्यक कार्यों में समय कितना व्यतीत हो रहा है। क्रोध मान माया लोभ सम्मान अपमान प्रत्येक स्थिति में समभाव समता रखें। जीवन में सद्गुणों का विकास करें। चंदनबाला, मूला सेठानी, धन्ना सेठ के उदाहरण से समझाया। प्राप्त 5 इन्द्रियों का पाप में नहीं पुण्य कार्य में उपयोग करें। जो प्राप्त है वह पर्याप्त है।
प्रवचन सभा को लाघव मुनि ने संबोधित करते हुए कहा कि जितना पुण्य होता है उतना सुख मिलता है, साधन मिलते हैं। जीवन में शांत रहें, मरने के बाद शांत होना ही है। जीवन में शांत रहे तो अनेक परेशानियों से बच जाया करते हैं। सुन्दर पक्षी को देखकर पिंजरे में बंद कर देते हैं। पक्षी सोचता है कि भगवान मैं सुन्दर नहीं होता तो मुझे पिंजरे में नहीं रहना पड़ता, मैं भी स्वतंत्र उड़ सकता, घूम सकता था। ठीक वैसे ही संसार की स्थिति है। स्वयं को मोह बंधनों में बांधकर हम स्वतंत्र होने की सोच रहे हैं। यह कैसे हो सकता है। आसक्ति हटाना होगा। कर्तव्य भाव से कार्य करें। मोह ममत्व से दूर रहें। अनासक्त भाव से जीएं तभी कल्याण मार्ग प्रशस्त होगा। शांति सुख समृद्धि का जीवन होगा। 
धर्मसभा में महासती पुष्पलता म.सा., सिद्धप्रभा  म.सा., जिनप्रभा म.सा. भी विराजित थी। अनेक श्रावक श्राविकाएं, साधुमार्गी जैन श्रावक संघ, समता युवा संघ, समता महिला मण्डल, बहु मण्डल, के पदाधिकारी सदस्य उपस्थित थे।
संघ अध्यक्ष रोशनलाल लोढ़ा ने बताया कि बुधवार को प्रवचन प्रातः 9.15 बजे शास्त्रीनगर समता भवन में होंगे, अधिकाधिक धर्मलाभ लेवें। हेमन्त मुनि आदि ठाणा 3 संत मीरानगर जैन स्थानक में विराजित हैं।

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