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July 13, 2025, 4:22 pm
KHABAR : खुद को अज्ञानी समझना ही सबसे बड़ा ज्ञान है, मनासा के उषागंज में आयोजित श्री भागवत महापुराण कथा में श्याम शुभम महाराज ने कहा, पहले दिन उमड़ी भक्तों की भीड़, पढ़े बद्रीलाल गुर्जर की खबर

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मनासा। भागवत जी महर्षि वेदव्यास की अंतिम रचना है पूर्व रधित सत्रह पुराणों से वे पूर्व संतुष्ट नहीं थे। तब नारद जी ने उनसे कहा जब तक, आप राम कृष्ण की गाथा नहीं रचेगे तब तक संतोष नहीं होगा। तब 18 हजार श्लोकों का महापुराण सारे जगत को उपलब्ध हुआ। यह ऐसा बिरला ग्रंथ है जो न केवल जीवित व्यक्ति के साथ ही मृत व्याक्ति का भी कल्याण करने वाला है प्रेत पीडा को दूर करने वाले इस महान ग्रन्थ का आरंभ ही प्रेत से है। धुंधकारी के उद्धार की कथा से इसका आरंभहै। श्री मद् भागवत का 'श्री' ही अनेको अर्थ से युक्त है। श्री का पहला आशय है 'सम्मान' और दूसरे का सम्मान भी वही कर सकता है जो स्वयं सम्मानित है। श्री का अर्थ है लक्ष्मी श्री का अर्थ है सरस्वती और श्री का अर्थ है दुर्गा । अर्थात धन संपदा, विद्या ज्ञान, और शक्ति तीनों श्री में समाहित है। भागवत ज्ञान की अनुभूति भी उसे ही होगी जिस पर ईश्वर की कृपा होगी ज्ञान को पाने की प्रथम सीढ़ी है रिक्तता। पाता वहीं है जो अहंकार आदि दोषो से रिक्त है। खुद को अज्ञानी समझना ही सबसे बड़ा ज्ञान है। उक्त आशय के सद विचार विख्यात कथा वाचक श्री श्याम शुभम जी महाराज ने उषागंज स्थित श्री राम मंदिर मनासा में आरंभ हुई सत्रह दिवसीय श्री भागवत महापुराण कथा के प्रथम दिवस की कथा में भागवत जी महत्ता को व्याख्यायित करते हुए व्यक्त किए। श्री श्याम शुभम् की विरली कथा शैली से मंदिर प्रांगण में बैठे सभी श्रोता मंत्र मुग्ध हो उठे। आप के मुखारविंद से बिहार, बंगाल, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मप्र आदि राज्यों के श्रोता कथा का श्रवण लाभ ले चुके है।

भागवत जी की कथा का प्रथम श्लोक का तात्विक विवेचन करते हुए सबीदानंद रुपाय के सदिचत और आनंद की प्रेरक व्याख्या करते हुए कहा सत्य का अर्थ है परम सत्य जो भगवान का ही स्वरूप है। भागवत पुराण का उद्देश्य है परम् सत्य को जानना और उसका साक्षात्कार करना। चित्त का अर्थ है भीतर का प्रकाश। पुस्तक पढ़ने में बाहरी प्रकाश चाहिए किन्तु चित्त है भीतरी प्रकाश अर्थात बुद्धि नहीं विवेक। विवेक यह है जो यह कहता है क्या सही है क्या गलत है। और आनंद वह है।

जो आकर जाता नहीं है। जो जाता है वह सुख है आनंद नहीं। आपके जीवन में आनंद नहीं है तो फिर तो आप जी नहीं रहे है। क्योकि आनंद प्रभु से जुड़ना है। प्रभु शरण ही आनंद है। सत्संग जीवन जीने की कला सिखाता है। कथा सुनकर आप बोर नहीं पुन होते सराबोर होते हैं। कथा भगवान राम कृष्ण की नहीं दस अवतारों की कथा है। प्रथम दिवस की कथा श्रवण में उपस्थित सारे ही श्रोता खड़े लेकर भूम उठे। आयोजक श्री पंजाबी समाज द्वारा 11 से 27 जुलाई तक रात्रि 8 से 10 तक चलने चलने व वाली कथा में श्रोताओं से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होने के आमंत्रित किया गया है।

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