मंदसौर। गांधीसागर डेम की मछलियों की डिमांड अब देशभर में तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि इस वर्ष डेम का मत्स्याखेट ठेका रिकॉर्ड 116 करोड़ में सात वर्षों के लिए नीलाम हुआ है। यह पिछली बार के मुकाबले 44 करोड़ अधिक है। पिछला ठेका पांच वर्षों के लिए 72 करोड़ में हुआ था। इस बार टेंडर भोपाल के लतीफ खान के नाम रहा।
पिछले चार माह से ठप पड़ा था काम-
पिछले चार महीनों से ठेका समाप्त होने के कारण डेम में मछली पकड़ने का कार्य पूरी तरह ठप पड़ा था, जिससे करीब 22 समितियों के दो हजार से अधिक मछुआरे बेरोजगार हो गए थे। अब नए ठेके के साथ ही एक बार फिर गांधीसागर में मत्स्याखेट गतिविधियां शुरू होने जा रही हैं।
देश का प्रमुख मत्स्य उत्पादन केंद्र गांधीसागर-
गांधीसागर डेम मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मछली उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां से प्रतिवर्ष करीब 3000 मीट्रिक टन मछली दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में भेजी जाती है। डेम में मछलियों की गुणवत्ता और विविधता को लेकर खास पहचान है। यहां 53 से अधिक वैरायटी की मछलियां पाई जाती हैं। इनमें कतला, रोहू, पहन, पावदा, मुगल (नरेल), बाम, सिंगार जैसी प्रजातियां शामिल हैं, जिनकी देशभर में मांग बनी रहती है।
बढ़ती डिमांड का राज, गुणवत्ता और भौगोलिक विशेषता-
गांधीसागर में मीठे पानी की मछलियों की गुणवत्ता बेहद उत्तम मानी जाती है। इसका कारण यह है कि यहां की चंबल नदी पठारी और बारहमासी है। इससे पानी में प्राकृतिक पोषक तत्वों की मात्रा अधिक रहती है, जो मछलियों के विकास के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती है। यही वजह है कि यहां की मछलियों का स्वाद मीठा और ताजगी भरा होता है, जिससे उनकी मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है।
चाइना से मंगाई गई विशेष प्रजातियां-
डेम में अब आधुनिक केज सिस्टम से मछली पालन किया जा रहा है, जिसके तहत कई नई प्रजातियों का उत्पादन प्रारंभिक स्तर पर शुरू हुआ है। बेहतर उत्पादन और निर्यात को देखते हुए विभाग ने चीन से भी विशेष प्रजातियां जैसे सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प मंगाई थीं, जिनका उत्पादन अब सफलतापूर्वक हो रहा है और निर्यात भी किया जा रहा है। वर्तमान में गांधीसागर में मछली उत्पादन की दर प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम तक पहुंच चुकी है। जबकि सामान्य तालाबों में यह उत्पादन 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही होता है।
ठेके की प्रक्रिया और पिछली स्थिति-
डेम का पिछला ठेका गुजरात की नेवरोज कंपनी के पास था, जिसकी अवधि 16 जून 2025 को समाप्त हो गई थी। इसके बाद मत्स्य विभाग द्वारा छह बार टेंडर बुलाए गए, लेकिन कोई ठेकेदार नहीं आया। अंततः सातवीं बार दो ठेकेदारों ने आवेदन किए और इसमें भोपाल के लतीफ खान की बोली सर्वाधिक पाई गई। नया अनुबंध पूरा होते ही विभाग मत्स्याखेट कार्य शुरू करेगा। इससे पहले डेम में मछली चोरी की घटनाएं बढ़ गई थीं, जिन पर अब अंकुश लगने की उम्मीद है।
स्थानीय स्तर पर उत्साह-
ठेका प्रक्रिया पूरी होने के बाद मछुआरा समितियों में उत्साह का माहौल है। उनका कहना है कि इस निर्णय से रोजगार के अवसर फिर से खुलेंगे और गांधीसागर का मत्स्य उद्योग पहले से अधिक सशक्त होगा।